परमाणु की संरचना और इसके सिद्धांत | Theories Of Atomic Structure | Parmanu ki Sanrachna aur Iske Sidhdhant

परमाणु की संरचना और इसके सिद्धांत (Theories Of Atomic  Structure), डॉल्टन का परमाणु सिद्धांत 

अध्ययनों से पता चलता है कि प्रकृति में मौजूद सभी पदार्थ परमाणुओंसे मिलकर बने है। ये परमाणु अति सूक्ष्म होते है। भारत के महान महर्षि कणाद ने सैकड़ो वर्षों पूर्व परमाणु को अति सूक्ष्म अविभाजित कण माना था।यूनान के दार्शनिक अरस्तु और डाल्टन इन वैज्ञानिकों ने भी परमाणु को अति सूक्ष्म और अविभाजित कण माना है। कणाद द्वारा रचित “वैशेषिक दर्शन” में बताया गया है कि सम्पूर्ण पृथ्वी की रचना परमाणुओं से हुई है।
परमाणु के बारे में और अधिक जानकारी हम निम्न सिद्धांतों से प्राप्त करेंगे।

1. डाल्टन का परमाणु सिद्धांत (Dolton’s Atomic Theory)

जॉन डाल्टन ने सन 1808 में अपने प्रयोगों के आधार पर यह सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित है –
* तत्व अनेक सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है, जिसे परमाणु कहते है।
* परमाणु अविभाज्य है अर्थात परमाणु को किसी भी तरह और सूक्ष्मतर कणों में विभाजित नही किया जा सकता है।
* एक ही तत्व के परमाणु आकार, द्रव्यमान तथा अन्य सभी गुणों में एक-दूसरे से समान होते है, परन्तु भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणु परस्पर भिन्न होते है।
* दो या दो से अधिक तत्वों के परमाणु के संयोग से यौगिक का निर्माण होता है। किसी यौगिक में उसके अवयवी तत्वों के परमाणु की संख्या का अनुपात नियत होता है।

परमाणु और अणु में अन्तर (Atoms and Molecules)

डॉल्टन के बाद सन 1811 में इटली के एक रसायनज्ञ एमेडियो आवागाद्रो ने परमाणु तथा अणु में अंतर स्पष्ट करते हुए यह बताया कि किसी भी पदार्थ  के अति सूक्ष्म कण दो प्रकार के होते है।
1. परमाणु              2. अणु
 
1. परमाणु – परमाणु पदार्थ को बनाने वाली मूल इकाई है। परमाणु किसी पदार्थ का वह सूक्ष्मतम कण है जो उसकी रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेता है, परमाणु कहलाता है।
 
2. अणु –  दो या दो से अधिक परमाणुओं जो निश्चित अनुपात से अणु बनते है। किसी तत्त्व अथवा यौगिक का वह सूक्ष्मतम कण है, जिसका प्रकृति में स्वतंत्र अस्तित्व संभव है, अणु कहलाता है।
 
समपरमाण्वीय अणु – यदि किसी अणु में एक ही प्रकार के परमाणु होते है तो उसे समपरमाण्वीय (Homoatomic) अणु कहते है।
उदाहरण – N2 (नाइट्रोजन अणु), O2 (ऑक्सीजन अणु), Cl2 (क्लोरीन अणु)
 
विषम परमाण्वीय अणु – यदि किसी अणु में दो या दो से अधिक प्रकार के परमाणु सम्मलित हो तो उसे विषम परमाण्वीय (Heteroatomic) अणु कहते है। उदाहरण – H2O (जल), CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड), H2O2 (हाइड्रोजन पराक्साइड) आदि।

परमाणु और अणु में अंतर

क्रम सं. परमाणु  अणु 
1 परमाणु किसी तत्व का सूक्ष्मतम कण है जो उसकी रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेता है।  अणु किसी तत्व अथवा यौगिक का वह सूक्ष्मतम कण है जो स्वतंत्र अवस्था में रह सकता है। 
2 ये इलेक्टॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन से मिलकर बने होते है।  ये परमाणु से मिलकर बने होते है। 
3 परमाणु प्राय: स्वतंत्र अवस्था में नहीं रह सकते है।    अणु प्रकृति में स्वतंत्र अवस्था में रहे सकते है। 
4 रासायनिक अभिक्रियाओं में परमाणु लगभग अविभाज्य रूप में भाग लेते है तथा इनका स्वरुप स्पष्ट नहीं होता है।  रासायनिक अभिक्रियाओं में अणु प्राय: परमाणु में विभाजित हो जाते है, जो रासायनिक संयोग द्वारा अन्य प्रकार के अणु बनाते है। 

परमाणु के मौलिक कण (Fundamental Particle of Atom)

कई वैज्ञानिको ने यह सिद्ध कर दिया था की परमाणु कुछ मूलभूत कणों से मिलकत बना होता है जैसे इलेक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रॉन। यहाँ हम इन्ही मूलभूत कणो के बारे में विस्तार से जानेगे।

इलेक्ट्रॉन की खोज
इलेक्ट्रॉन की खोज सन 1859 में जे. जे. थॉमसन ने की थी। इन कणो का नामकरण स्टोनी ने किया था।
जे. जे. थॉमसन ने गैसों में कम दाब पर विद्युत प्रवाहित की।  लगभग सेमी लम्बी कांच की विसर्जन नलिका में लगभग 10-3 मि.मी. पारे के दाब पर किसी गैस को लिया गया और नाली के दोनों सिरों पर दो इलेक्ट्रोड लगाए गए।  दोनों इलेक्ट्रोड के बीच 1000 वोल्ट से 30000 वोल्ट तक का उच्च विभवांतर प्रयुक्त करने पर पाया गया की कांच की नली में कैथोड से कुछ किरणे निकल कर सामने वाली दीवार पर पड़ती है।  जिससे हरे रंग के प्रकाश की चमक उत्पन्न होती है, इन किरणों को जे. जे. थॉमसन ने कैथोड किरणे कहा।
जे. जे. थॉमसन ने कैथोड किरणों के कणो  पर उपस्थित ऋण आवेश एवं उनकी मात्रा का अनुपात ज्ञात करके बताया की ये अनुपात विसर्जन नलिका के इलेक्ट्रोडो के पदार्थ या नली में उपस्थित गैस की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता है परन्तु प्रत्येक दशा में नियत रहता है।

* इलेक्ट्रान क्रुक्स द्वारा प्राप्त की गयी कैथोड किरणों के ऋणावेशित कण होते है।
* इलेक्ट्रान का द्रव्यमान = 9.1×10-28 ग्राम या 9.1×10-31 किग्रा
* इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान हाइड्रोजन की तुलना में 1/1840 होता है।
* इलेक्ट्रान पर आवेश की खोज मिलिकन के द्वारा की गयी।
* इलेक्ट्रान पर आवेश C.G.S पद्धति में 4.8×10-10 esu

M.K.S पद्धति ने 1.6×10-19 कुलाम होता है।
(1esu = 3.33×10-10 कुलाम)
* इलेक्ट्रॉन की मौलर संहति = 9.1×10-28 या 6.023×10-23
= 5.49×10-4 ग्राम/मोल
* इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान  = 0.000527 amu होता है।

प्रोटॉन की खोज
प्रोटॉन की खोज गोल्डस्टीन ने 1886 में की थी।
यदि विसर्जित नलिका के मध्य छिद्रित कैथोड़ का प्रयोग किया जाये एवं कम दाब पर गैसों में विद्युत प्रवाहित की जाये तो एक प्रकार की किरण उत्प्न्न होती है, जो एनोड से कैथोड़ की ओर गतिशील होती है एवं कैथोड़ के छिद्र से निकलकर विसर्जन नलिका की दीवार से टकराकर चमक उत्प्न्न करती है। इन किरणों को एनोड किरणे, कैनाल किरण या गोल्डस्टीन किरणे कहा जाता है।

* ये एनोड किरणों में उपस्थित धनावेशित कण होते है जबकि  विद्युत विसर्जन नलिका में हाइड्रोजन (H) गैस भरी हो।
* प्रोटॉन का द्रव्यमान 1.672×10-24 ग्राम होता है।
* इसका द्रव्यमान 1.0072 A.m.u होता है।
* प्रोटॉन का द्रव्यमान H के द्रव्यमान के समान होता है।
* प्रोटॉन पर आवेश = +4.8×10-10 esu
= +1.6×10-19 कुलाम
* नाभिक में उपस्थित प्रोटॉन की संख्या परमाणु क्रमांक कहलाती है। इसकी खोज मोजले ने की थी। यह परमाणु के भौतिक गुण होता है। मोजले के अनुसार इलेक्ट्रॉन की धातु पर बौछार से विकिरणों की आवृत्ति नाभिकीय आवेश के समानुपाती होती है।

$sqrt{nu }propto (z-b)$

$sqrt{nu }=a(z-b)$
जहाँ a,b नियतांक  z = नाभिकीय आवेश या परमाणु क्रमांक होता है।
$nu $= उत्पन्न विकिरणों की आवृति

न्यूट्रॉन की खोज

* न्यूट्रॉन की खोज चैडविक के द्वारा की गयी।
* इन उदासीन कणों के द्रव्यमान 1.675×10-24 ग्राम होता है।
* न्यूट्रॉन का द्रव्यमान 1.0086 Amu होता है।
* उदासीन परमाणुओं में इलेक्ट्रान व प्रोटॉन की संख्या परमाणु क्रमांक के समान होती है। इस आधार पर तत्व के एक परमाणु में उपस्थित  प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान ज्ञात किया जा सकता है।
* तत्वों का वास्तविक द्रव्यमान उनमें उपस्थित प्रोटॉनों व इलेक्ट्रॉनों के द्रव्यमान के लगभग दुगुने होते है।
* रदरफोर्ड ने इसी आधार पर बताया कि तीसरे प्रकार के कण भी विद्यमान होते है। जिनका भार हाइड्रोजन के परमाणु भार के लगभग बराबर होता है।

थॉमसन का परमाणु मॉडल (Thomson’s Atomic Model)

पहले जे.जे. थॉमसन ने इलेक्ट्रॉन व प्रोटॉन की परमाणु में व्यवस्था ज्ञात करने के लिए एक मॉडल प्रस्तुत किया, जिसे थॉमसन का परमाणु मॉडल कहा जाता है।
इस परमाणु मॉडल के अनुसार धनायन पूरे गोले में फैला रहता है, जिसकी त्रिज्या 10-4 से.मी. है। इसमें इलेक्ट्रॉन बीच मे रहकर इसे उदासीन बनाता है।
इस मॉडल के अनुसार जिस प्रकार पुडिंग (एक प्रकार की मिठाई) में प्लम (एक प्रकार का फल) पाये जाते है, उसी प्रकार परमाणु में इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते है। अतः थॉमसन के परमाणु मॉडल को प्लम-पुडिंग मॉडल भी कहा जाता है।

रदरफोर्ड का स्वर्ण पत्र प्रयोग (Gold Foil Experiment of Rutherford)

थॉमसन के प्लम-पुडिंग मॉडल के पश्चात रदरफोर्ड ने अपने ओरयोगो के आधार पर अपना परमाणु प्रतिरूप प्रस्तुत किया, जिसे सौर प्रतिरूप या ग्रहीय प्रतिरूप कहते है।
इस प्रयोग के निम्नलिखित मुख्य चरण है –

* रदरफोर्ड ने सोने की पतली झिल्ली (0.004 m.m) पर @ कणों की बौछार की (α कण हीलियम के द्विधनावेशित नाभिक होते है) तथा यह देखा कि

  1. अभिकांश α कण सीधे ही गमन कर जाते है।
  2. कुछ α कण अपना मार्ग परिवर्तित कर लेते है।
  3. 20000 में से एक-दो कण पुनः अपने मार्ग में लौट जाते है।
उपरोक्त प्रक्षेणो के आधार पर रदरफोर्ड के परमाणु प्रतिरूप की संकल्पनाएँ निम्न है –
  1. परमाणु के केंद्र में अति सूक्ष्म धनावेशित भाग नाभिक होता है।
  2. परमाणु खोखला होता है।
  3. इस खोखले परमाणु में ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारो ओर वृत्ताकार पथ में चक्कर लगाते है।
  4. परमाणु का समस्त भार नाभिक में केन्द्रित होता है तथा नाभिक का आकार 10-15 m होता है।
  5. परमाणु के आयतन की तुलना में नाभिक का आयतन 1015 गुणा छोटा होता है।

परमाणु का आयतन/नाभिक का आयतन $frac{Volume.of.atom}{Volume.of.nucleus}$
$frac{frac{4}{3}pi {{r}^{3}}}{frac{4}{3}pi {{r}^{3}}}=frac{{{({{10}^{-10}})}^{3}}}{{{({{10}^{-15}})}^{3}}}={{10}^{15}}$

रदरफोर्ड के मॉडल की कमियाँ
1. नाभिक के चारो ओर घूमते हुए इलेक्ट्रॉन के द्वारा विद्युत चुम्बकीय विकिरणों के रूप मे (मैक्सवेल के अनुसार) ऊर्जा का उत्सर्जन होना चाहिए, अतः ऊर्जा में कमी के कारण धीरे धीरे इलेक्ट्रॉन नाभिक के निकट आते हुए अन्त में नाभिक में गिर जाना चाहिए किन्तु ऐसा नही होता।
2. रदरफोर्ड कोई हाइड्रोजन परमाणु के रेखिय स्पेक्ट्रम की व्याख्या  नही कर सका अर्थात स्पेक्ट्रमी रेखाओ की उत्पति क् कारण नही बता सका।

मैक्स प्लांक का क्वांटम सिद्धान्त –
“किसी फोटोन की ऊर्जा उसकी आवृति के समानुपाती होती है।”
अर्थात
$begin{align} & Epropto nu \ & E=hnu \ end{align}$

जहाँ – h  = 6.625×10-27 अर्ग-परमाणु
$nu $ = फोटोन की आवृति
E = फोटोन की ऊर्जा
* प्लांक के अनुसार किसी भी तत्व के द्वारा ग्रहण की गयी अथवा उत्सर्जित की गयी ऊर्जा कानो के रूप में होती है, जिन्हें क्वांटा या फोटोन कहते है।

नील्स बोर की परिकल्पनाएं (Bohr’s Postulate)

बोर ने रदरफोर्ड मॉडल में संशोधन करने हेतु निम्न परिकल्पनाएं प्रस्तुत की। इसके अनुसार –
1. परमाणु के केन्द्र में अति सूक्ष्म धनावेशित भाग नाभिक पाया जाता है, जिसमे परमाणु का समस्त भाग केन्द्रित रहता है।
2. इलेक्ट्रान इस नाभिक के चारो ओर वृत्ताकार पथ में चक्कर लगाते है, जिन्हें ऊर्जा स्तर कहते है। यह क्रमशः K, L, M, N, O आदि होते है।
3. ये उन्ही वृत्ताकार कक्षों में चक्कर लगाते है जिनका कोणीय संवेग h/2n का पूर्ण गुणांक होता है। h = प्लांक स्थिरांक
4. इलेक्ट्रान नाभिक की ओर कुलाम्बिक आकर्षण बल तथा नाभिक के विपरीत अपकेन्द्रीय बल से संतुलित रहकर चक्कर लगाते है।
5. इलेक्ट्रॉन ऊर्जा स्तर में निश्चित वेग से चक्कर लगाते है।

अणु और परमाणु में इलेक्ट्रॉन की गणना करना –

1. 18 gm H2O में इलेक्ट्रॉन के कितने मोल होंगे ?
हल : H2O में इलेक्ट्रॉन की संख्या = 10
चूँकि 18 gm H2O = 1 मोल 
∴ 18 gm H2O में e = 10 मोल 

2. 8 gm आणविक ऑक्सीजन में उपस्थित e की संख्या होगी ?
हल – O2 के मोल = O2 के gm / O2 के अणुभार 
= 8/32 = 1/4
= 0.25
चूँकि O2 में e की संख्या = 16N
∴ 0.25 मोल O2 में e की संख्या = 16N × 0.25 = 4N
= 4 × 6.023 × 10-23
⇒ इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान = 0.000527 A.m.u होता है।

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