NCERT Notes for Class 8 Science Chapter 1 Crop Production and Management | कक्षा 8 विज्ञान अध्याय 1 फसल उत्पादन एवं प्रबंध नोट्स

NCERT Notes for Class 8 Science Chapter 1 Crop Production and Management | कक्षा 8 विज्ञान अध्याय 1 फसल उत्पादन एवं प्रबंध Science for class 8 लगभग 10,000 ई पू तक मनुष्य घुमन्तु थे। वे समूह में एक स्थान से दूसरे स्थान तक भोजन एवं आवास की खोज में विचरण करते रहते थे। वे कच्चे फल और सब्जियाँ खाते थे और उन्होंने भोजन के लिए जंतुओं का शिकार करना प्रारम्भ कर दिया। समय बीतता रहा और समय के साथ मनुष्य ने खेती करना सीख लिया। खेती कर, चावल, गेंहू एवं अन्य खाद्य फसलों को उत्पादित करने लगा। इस प्रकार कृषि का प्रारम्भ हुआ।

NCERT Notes for Class 8 Science Chapter 1 Crop Production and Management | कक्षा 8 विज्ञान अध्याय 1 फसल उत्पादन एवं प्रबंध
Science for Class 8

सभी जीवों को भोजन की आवश्यकता होती है। पौधे अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण द्वारा स्वयं बना सकते हैं। मनुष्य सहित अन्य सभी जंतु भोजन बनाने में असमर्थ है। मनुष्य एवं अन्य सभी जंतु भोजन के लिए सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से पौधों पर निर्भर करते हैं।
भारत एक विशाल देश है। यहाँ अलग-अलग क्षेत्रों में तापमान, आर्द्रता, वर्षा जैसी जलवायवीय परिस्तिथियों में विभिन्नता पायी जाती है। अतः क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग फसल उगाई जाती है।
आज इस अध्याय में हम जानेगे की किसी भी फसल को उगाने में कौन-कौन से चरण होते है? किन विधियों द्वारा फसल को उगाया जाता है? फसल पक जाने के बाद इसका प्रबंध किस प्रकार से किया जाता है?

फसल (Crop)

जब एक ही किस्म के पौधे किसी स्थान पर बड़े पैमाने (बहुत बड़े क्षेत्र) में उगाये जाते है, तो इसे फसल कहते हैं।
उदाहरण – मक्का की फसल का तात्पर्य यह है कि उस क्षेत्र में उगाये गए सभी पौधें मक्का के हैं।
गेंहूँ की फसल का अर्थ है कि खेत में उगाये जाने वाले सभी पौधे गेंहूँ के हैं।

फसलों को मुख्य रूप से दो वर्गों में बाँटा जा सकता है, किन्तु हम यहाँ फसल के तीन वर्गों के बारे में चर्चा करेंगे।

1. खरीफ़ की फसल (Kharif Crop) 2. रबी की फसल (Rabi Crop) 3. जायद की फसल (Zaid Crop)

1. खरीफ़ की फसल (Kharif Crop)

ऐसी फसल जिन्हें वर्षा ऋतु में बोया जाता है, खरीफ़ की फसल कहलाती है।

  • भारत में वर्षा ऋतु सामान्यत: जून से सितम्बर तक होती है। अतः जून से सितम्बर तक उगाई जाने वाली फसलें खरीफ़ की फसल होती है।

खरीफ़ की फसल के उदाहरण – मक्का, सोयाबीन, धान, मूँगफली, कपास इत्यादि खरीफ़ की फसलें हैं।

2. रबी की फसल (Rabi Crop)

शीत ऋतू में उगाई जाने वाली फसलें, रबी की फसल कहलाती है।

  • भारत में शीत ऋतु सामान्यत: अक्टूबर से मार्च तक होती है। अतः अक्टूबर से मार्च तक उगाई जाने वाली फसलें रबी की फसल होती है।

रबी की फसल के उदाहरण – गेंहूँ, मटर, अलसी, चना, सरसों आदि रबी की फसलें हैं।

3. जायद की फसल (Zaid Crops)

वर्ष की दो मुख्य फसलों के बीच में अथवा किसी मुख्य फसल के पहले अपेक्षाकृत् लघु समय में उत्पन्न की जाने वाली फसल को जायद/अंतवर्ती फसल कहते है।

  • जायद फसलों की बुआई फरवरी से मार्च महीने में किया जाता है।
  • इसकी कटाई अप्रेल से मई के बीच में किया जाता है।
  • इसमें सूखा सहन करने की क्षमता होती है।

जायद की फसल के उदाहरण – धान, बाजरा, जूट, कपास, तिलहन, खरबूजा, तरबूज, ककड़ी आदि जायद की फसल के उदाहरण है।

आधारिक फसल पद्धतियाँ (आधारिक फसल पद्धति क्या है?) | Basic Cropping Production

फसल उगाने से लेकर उसको सम्पूर्ण रूप से तैयार करने तथा उसके भंडारण तक किसानों द्वारा किये जाने वाले कार्य, आधारिक फसल पद्धतियाँ कहलाती है।
ये क्रियाकलाप अथवा कार्य कृषि पद्धतियाँ मुख्यत: 7 प्रकार की होती है जो आगे विस्तार से दी जा रही है।

  1. मिट्टी तैयार करना
  2. बुआई 
  3. खाद एवं उर्वरक देना
  4. सिंचाई
  5. खरपतवार
  6. कटाई
  7. भण्डारण

(i) मिट्टी तैयार करना (Preparation of Soil)

मिट्टी तैयार करना फसल उगाने का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। इस चरण में मिट्टी को खोदकर पलटा तथा पोला बनाया जाता है। मिट्टी को उलटने-पलटने एवं पोला करने की प्रक्रिया, जुताई कहलाती है। ऐसा करने से जड़ें भूमि में गहराई तक जा सकती है। पौधे की जड़ें गहराई में जाने से उन्हें श्वसन करने में सहायक है।
मिट्टी की जुताई हल चलाकर की जाती है। अगर मिट्टी बहुत ज्यादा सूखी है तो उसमे जुताई से पहले पानी डाल दिया जाता है, जिससे की मिट्टी नरम हो जाती है।
किसान के मित्र कहे जाने वाले केंचुएँ और सूक्ष्मजीव भी पोली मिट्टी में तेजी से वृद्धि करते हैं। जो फसल के लिए आवश्यक है। केंचुएँ तथा सूक्ष्मजीव मिट्टी को और अधिक पलटकर पोला बनाये रखते हैं तथा ह्यूमस बनाते है। Science for Class 8

मिट्टी तैयार करने के कारण

चूँकि हम सभी जानते हैं कि मिट्टी में खनिज, जल, वायु तथा कुछ सजीव होते है। इसके अलावा मृत पौधे एवं जंतु भी मिट्टी में पाए जाने वाले जीवों द्वारा अपघटित होते हैं। इस प्रक्रम में मृतजीवों में पाए जाने वाले पोषक मिट्टी में निर्युक्त होते हैं। यह पोषक पौधों द्वारा अवशोषित किये जाते है। 
मिट्टी की ऊपरी परत में कुछ सेमी ही पौधे की वृद्धि में सहायक है। अतः इसे उलटने-पलटने और पोला करने से पोषक पदार्थ ऊपर आ जाते हैं और पौधे इस पौधक पदार्थों का उपयोग कर सकते हैं। अतः मिट्टी को तैयार करना बहुत ही महत्वपूर्ण चरण है।

मिट्टी तैयार करने में काम आने वाले औज़ार – हल, पाटल, कुदाली एवं कल्टीवेटर।

हल (Plough) – यह लकड़ी या लोहे का बना होता है। हल को बैल, घोड़े या ऊँट की सहायता से खींचा जाता है। इसमें लगी लोहे की मजबूत पत्ती को फाल कहते हैं। लकड़ी से बना लम्बा भाग मुख्य भाग होता है, जिसे हल-शैफ्ट कहते हैं। इसके एक सिरे पर हैंडल लगा होता है तथा दूसरा सिरा जोत के डंडे से जुड़ा होता है। इसी सिरे को बैलों की गर्दन के ऊपर रखा जाता है। 
हल (Plow)

कुदाली (Hoe) – यह एक सरल औज़ार है। इसमें लकड़ी या लोहे की छड़ होती है। जिसके एक सिरे पर लोहे की चौड़ी और मुड़ी प्लेट लगी होती है जो ब्लेड की तरह कार्य करती है तथा दूसरे भाग को पशु खींचते हैं।
कुदाली Hoe

कुदाली का कार्य – खरपतवार को निकलने में, मिटटी को पोला करने में 

कल्टीवेटर (Cultivator) – यह ट्रेक्टर से खींचे जाने वाला लोहे का बना यंत्र होता है, जिसमे कई हल जैसी आकृतियाँ लगी होती है। इसके उपयोग से समय और श्रम दोनों की बचत होती है।
कल्टीवेटर (Cultivator)

पाटल (Patal) – जुताई के समय कभी-कभी मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले बन जाते हैं, जिसे समतल करना जरुरी होता है। अतः भूमि को समतल करने के काम आने वाले औज़ार को पाटल कहते हैं।

(ii) बुआई (Sowing)

यह भी फसल उत्पादन का महत्वपूर्ण चरण है। तैयार मिट्टी में बीजों को बौना, बुआई कहलाता है।
बुआई करने से पहले अच्छी गुणवत्ता वाले साफ़ और स्वस्थ बीजों का चयन किया जाता है।

स्वस्थ बीजों का चयन (स्वस्थ बीजों का चयन कैसे करें) | Choosing Good Quality Seeds
एक बर्तन लेंगे। उसे जल से आधा भर लेते है। अब इसमें एक मुट्ठी गेंहूँ डालते हैं। इसे हिलाकर कुछ समय के लिए छोड़ देते हैं। कुछ समय बाद हम देखते हैं कि कुछ बीज पानी में ऊपर तैरने लगते हैं तथा कुछ बीज बर्तन के पैंदे में बैठ जाते हैं। जो बीज जल की सतह पर तैरते है वो खोखले थे, जिस कारण हलके हो गए और पानी में ऊपर आ गए। इसके विपरीत जो बीज अच्छे एवं स्वस्थ थे वो जल के पैंदे में जाकर जमा हो जाते है।
अच्छे और स्वस्थ बीजों को क्षतिग्रस्त बीजों से अलग करने की यह एक अच्छी विधि है।

बुआई में काम आने वाले औज़ार (Sowing Tools)
(a) कीप यंत्र (Funnel Tool)
बीजों की बुआई में काम आने वाला परम्परागत औज़ार कीप के आकार का होता है। बीजों को कीप के अंदर डालने पर यह दो या तीन नुकीले सिरे वाले पाइपों से गुजरते हैं। ये सिरे मिट्टी को हटाकर बीज को मिट्टी में डाल देते हैं।

कीप यंत्र Funnel Tool

(b) सीड-ड्रिल (Seed-Drill)
सीड ड्रिल ट्रेक्टर के पीछे लगाकर बीज बौने का एक यंत्र है। इसके द्वारा बीजों में समान दूरी एवं गहराई बनी रहती है। यह सुनिश्चित करता है कि बुआई के बाद बीज मिट्टी द्वारा ढक जाए। इससे पक्षी भी बीजों को नहीं खा पाते हैं। सीड-ड्रिल से समय और श्रम दोनों कि बचत होती है।

सीड-ड्रिल Seed-Drill

पौधों को उचित दूरी पर लगाना क्यों आवश्यक है? (Spacing the Plants)
पौधों को अत्यधिक घने होने से रोकने के लिए बीजों के बीच उचित दूरी होना अत्यंत महत्पूर्ण है। इससे पौधों को सूर्य का प्रकाश, पोषक एवं जल पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होता है। अधिक घनेपन को रोकने के लिए कुछ पौधों को निकाल कर हटा दिया जाता है। 

(iii) खाद एवं उर्वरक मिलाना (Manure and Fertilizer Mix)

फसल उत्पादन का ये तीसरा महत्वपूर्ण चरण हैं। फसलों के लगातार उगाने से मिट्टी में कुछ पोषकों की कमी हो जाती है। इस क्षति को पूरा करने हेतु किसान खेतों में खाद देते हैं। यह प्रक्रम खाद देना कहलाता है। 
नोट :- खाद को आवश्यकतानुसार ही देना चाहिए, न तो ज्यादा न ही कम अन्यथा पौधे कमजोर हो जाते हैं।

खाद एवं उर्वरक – ऐसे पदार्थ जो मिट्टी में पोषक स्तर को बनाये रखते हैं, खाद एवं उर्वरक कहलाते हैं।

खाद – खाद एक कार्बनिक (जैविक) पदार्थ है जो कि पौधों या जंतु अपशिष्ट, मल, पत्तियों आदि से प्राप्त होता है।

खाद बनाना 
खाद बनाने के लिए एक गड्डा कर लिया जाता है। किसान पादप एवं जंतु अपशिष्टों को इस गड्डे में डालते देते हैं तथा इसका अपघटन होने के लिए खुले में छोड़ देते हैं। अपघटन कुछ सूक्ष्म जीवों द्वारा होता है। इस प्रकार प्राप्त होने वाला पदार्थ खाद होता है।

उर्वरक – उर्वरक रासायनिक पदार्थ होते हैं। इनमे विशेष पोषक होते है। उर्वरक का उत्पादन फैक्ट्रियों में किया जाता है।
उर्वरक के उदाहरण – यूरिया, अमोनियम सल्फेट, सुपर फॉस्फेट, पोटाश, NPK (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम)।

उर्वरको से होने वाली हानियाँ

  • उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता में कमी आ जाती है।
  • यह जल प्रदूषण का कारण भी बन जाती है।

नोट :- उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता में कमी आ जाती है। उर्वरकों के स्थान पर हमें जैविक खाद का उपयोग करना चाहिए अथवा दो फसलों के बीच में खेत को कुछ समय के लिए बिना कुछ उगाए छोड़ देना चाहिए।

खाद, उर्वरक से बेहतर (खाद के लाभ) Manure is better than fertilizer (Benefits of manure)

  • खाद के उपयोग से मिट्टी के गठन एवं जल अवशोषण क्षमता में भी वृद्धि होती है।
  • इसमें मिट्टी के सभी पोषकों की प्रतिपूर्ति हो जाती है। 
  • इससे मिट्टी भुरभुरी एवं सरंध्र हो जाती है। जिसके कारण गैस विनिमय सरलता से होता है।
  • इससे मित्र जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि हो जाती है।
  • जबकि उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता में कमी आ जाती है।

फसल चक्र (Crop Rotation)

जब खेत में एक फसल के बाद दूसरे किस्म की फसल एकांतर क्रम में उगाई जाती है तो, इस प्रकार के चक्र को फसल चक्र कहते हैं।
फसल चक्र का उदाहरण 
पहले, उत्तर भारत में किसान फलीदार चारा एक ऋतु में उगाते थे तथा गेंहूँ दूसरी ऋतु में। इससे मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी वापस पूरी हो जाती है।

उर्वरक एवं खाद में अंतर (Difference between Fertilizer and Manure)

उर्वरक खाद
उर्वरक एक मानव निर्मित पदार्थ है। खाद एक प्राकृतिक पदार्थ है, जो गोबर एवं पौधों के अवशेष के विघटन से प्राप्त होता है।
उर्वरक का उत्पादन फैक्ट्रियों में होता है। खाद खेतों में बनाई जाती है।
उर्वरक से मिट्टी को ह्यूमस प्राप्त नहीं होती है। खाद से मिट्टी को ह्यूमस प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है।
उर्वरक में पादप पोषक जैसे कि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम प्रचुरता में होते हैं। खाद में पादप पोषक तुलनात्मक रूप से कम होते हैं।

(iv) सिंचाई (Irrigation)

जल ही जीवन है अर्थात जीवित रहने के लिए सभी जीवों को जल की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार पौधे की वृद्धि एवं परिवर्धन के लिए जल का विशेष महत्व है। पौधों में लगभग 90% जल होता हैं। 
निश्चित अंतराल पर खेत में जल देना सिंचाई कहलाता है। 
सिंचाई का समय, मात्रा एवं बारम्बारता फसलों, मिट्टी एवं ऋतु में भिन्न होता है। गर्मीं में फसलों को अधिक पानी दिया जाता है क्योंकि गर्मी में अधिक पानी की आवश्यता होती है।

पौधे की जड़ों द्वारा जल का अवशोषण होता है जिसके साथ में खनिज लवण तथा उर्वरकों का भी अवशोषण होता है। जल से बीजों का अंकुरण होता है क्योंकि बीजों का अंकुरण सूखे में नहीं हो सकता है। जल में घुले हुए पोषक का स्थानांतरण पौधे के प्रत्येक भाग में होता है। lपौधे में जल की उपस्थिति पाले एवं गर्म हवा से रक्षा करता है। अतः स्वस्थ फसल की वृद्धि के लिए मिट्टी की नमी बनाये रखना आवश्यक है। जिसे सिंचाई करके पूरा किया जाता है।

सिंचाई के स्रोत – सिंचाई के प्रमुख स्रोत कुएँ, जलकूप, तालाब/झील, बांध, नदियाँ, नहरें हैं।

सिंचाई के पारंपरिक तरीके
सिंचाई के स्रोतों से पानी को निकल कर उसे खेतों तक पहुँचाने के अलग-अलग तरीके हैं, जो भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न होते हैं।
विभिन्न पारंपरिक स्रोत निम्न हैं :-

(i) मोट (घिरनी) Moat (Pulley System) (ii) चेन पम्प Chain Pump
मोट घिरनी Moat Pulley System चेन पम्प  Chain Pump
(iii) ढेकली (Dhekali) (iv) रहत (उत्तोलक तंत्र) (Rahat Level System)
ढेकली Dhekali
रहत (उत्तोलक तंत्र) Rahat Level System

नोट :- जल को ऊपर खींचने के लिए सामान्यतः पम्प का उपयोग किया जाता है। पम्प को डीज़ल, पेट्रोल, बायोगैस, विद्युत अथवा सौर ऊर्जा से चलाया जाता है।

सिंचाई की आधुनिक विधियाँ Modern Methods of Irrigation

सिंचाई की आधुनिक विधियाँ वे हैं जिनका उपयोग करके हम जल की बचत कर सकते हैं।
मुख्य सिंचाई की आधुनिक विधियाँ निम्न हैं –

  • छिड़काव तंत्र (Sprinkler System)
  • ड्रिप तंत्र (Drip System)

(i) छिड़काव तंत्र (Sprinkler System)

  • असमतल भूमि के लिए
  • ऐसे स्थान पर जहाँ जल की मात्रा कम हो 

छिड़काव तंत्र Sprinkler System

 

 

 

 

 

 

 

 

इस विधि में सीधे पाइपों के ऊपर के सिरों पर घूमने वाले नोज़ल लगे होते है। सभी पाइप एक निश्चित दुरी पर मुख्य पाइप से जुड़े होते है। जब मुख्य पाइप में जल का प्रवाह किया जाता है तो वह छोटे पाइपों से होता हुआ घूमते हुए नोज़ल तक पहुँचता है और बाहर निकल जाता है। ये छिड़काव तंत्र ऐसा लगता है जैसे वर्षा।
इस प्रकार का छिड़काव लॉन, कॉफ़ी की खेती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

(ii) ड्रिप तंत्र (Drip System)

इस विधि में जल बूँद-बूँद करके सीधे ही पौधे की जड़ों में जाता है। अतः इस विधि को ड्रिप तंत्र कहते हैं।
इस प्रकार की विधि का उपयोग फलदार पौधों, बगीचों एवं वृक्षों में किया जाता है। यह सिंचाई की सर्वोत्तम विधि है, जिसमे एक बूँद पानी भी व्यर्थ नहीं होता है।

ड्रिप तंत्र Drip System

(v) खरपतवार (Weeds)

फसल के साथ प्राकृतिक रूप से कई अवांछित पौधे उग जाते हैं, जिन्हें खरपतवार कहते हैं।

निराई – खरपतवार को हटाने को निराई कहते हैं।
खेतों में निराई करना बहुत आवश्यक है क्योंकि फसल के साथ उगे अवांछित पौधे जल, पोषक, जगह एवं प्रकाश की स्पर्धा कर फसल की वृद्धि पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। फसल काटते समय भी ये बाधा उत्पन्न करते हैं। कुछ खरपतवार तो विषैले भी होते है, जो मनुष्य और पशुओं के लिए हानिकारक है।

खरपतवार से सुरक्षा Protection from Weeds

किसान खरपतवार हटाने के लिए कई तरीके अपनाता है, कुछ निम्न हैं 

  • हाथ से जड़ सहित तोड़कर या फसल उगने से पहले मिट्टी को तैयार करके।
  • खरपतवार हटाने का सर्वोत्तम समय उनमें पुष्पण एवं बीज बनने से पहले का होता है।
  • खरपतवार हटाने के लिए खुरपी या हैरो की सहायता ली जाती है।
  • खरपतवार को रसायनो की सहायता से भी हटाया जाता है, जिनमें 2, 4-D मुख्य खरपतवारनाशी हैं। 
  • खरपतवारनाशी का प्रयोग करते समय मुँह और नाक पर कपड़ा लपेट लेना चाहिए।

(vi) कटाई (Harvesting)

फसल पक जाने के बाद उसे काटना, कटाई कहलाता है। यह भी महत्वपूर्ण चरण है। कटाई या तो पौधों को हाथ से खींचकर उखाड़ कर अथवा उसे भूमि के समंतल किसी औज़ार से काट कर की जाती है।

कटाई में काम आने वाले औज़ार

दराँती – दराँती की सहायता से हाथ द्वारा कटाई की जाती है।
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हार्वेस्टर (Harvester) – हार्वेस्टर मशीन की सहायता से भी फसल की कटाई की जाती है। इसके द्वारा कम समय और मेहनत में कटाई हो जाती है।

फसल को साफ करना

थ्रेशिंग (Threshing) – काटी गई फसल से बीजों/दानों को भूसे से अलग करना, थ्रेशिंग कहलाता है।
थ्रेशिंग का काम कॉम्बाइन मशीन से किया जाता है। कॉम्बाइन मशीन हार्वेस्टर और थ्रेशर का सम्मिलित रूप है।
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नोट :- छोटे किसान अनाज के दानों को फाटक कर (विनोइंग) अलग करते हैं।

(vii) भण्डारण (Storage)

साफ की गई फसल को उचित तरह से सुरक्षित स्थान पर रखना, भंडारण कहलाता है। यह एक महत्वपूर्ण चरण है। इसमें चूक होने पर पूरी मेहनत ख़राब हो सकती है। भण्डारण यदि अधिक समय के लिए किया जाना है, तो उन्हें नमी, कीट, चूहों एवं सूक्ष्मजीवों से सुरक्षित रखना होगा।
ताज़ा काटी गई फसल में नमी होती है। अतः भण्डारण करने से पूर्व बीजों को सुखाकर नमी को ख़त्म कर दिया जाता है। जिससे बीज ख़राब नहीं होते हैं। 
भण्डारण करने के लिए किसान अपनी फसल उत्पाद को जूट के बोरों, धातु के बड़े पात्र एकत्रित करते हैं।

साइलो (Silos) – साइलो अनाज के भण्डारण की नवीनतम एवं आधुनिक तकनीक हैं, जिसके द्वारा बहुत बड़ी मात्रा में अनाज का भण्डारण आसानी से किया जा सकता है।

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नोट :- छोटे किसान और घरों में लोग अनाज में सुखी नीम की पत्तियाँ डाल कर भण्डारण करते हैं। 

पशुपालन – बहुत बड़ी मात्रा में पशुओं पालना, पशुपालन कहलाता है।

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