Maharana Pratap History in Hindi | महाराणा प्रताप की जीवनी

Maharana Pratap History in Hindi MAHARANA PRATAP JIVANI महाराणा प्रताप एक ऐसा नाम जिसे युगों-युगों तक याद किया जायेगा। एक ऐसा शूरवीर जिसने मरते दम तक कभी हार नहीं मानी। अपने शत्रुओं को परास्त किया। अपने देश, राज्य धर्म की रक्षा करते हुए जीवन बिताया।
Maharana Pratap History in Hindi | महाराणा प्रताप की जीवनी हिन्दी अनूठी आन, बान एवं शान वाला यह राजस्थान प्रांत शक्ति, भक्ति एवं अनुरक्ति की त्रिवेणी माना जाता है। यहां का इतिहास शौर्य एवं औदार्य के लिए विश्वविख्यात रहा है। यहां जान से बढ़कर आन तथा प्राण से बढ़कर प्रण की शाश्वत परम्परा रही है। राजस्थान की इस तपोभूमि की कुछ ऐसी विशेषताएं रही हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ है। यूं तो वीरभूमि राजस्थान का एक-एक अंग वीरत्व के अनगिन उदाहरणों का साक्षी है पर उसका मेवाड़ क्षेत्र तो अपनी वीरता, धीरता, मातृभूमि-प्रेम, शरणागत वत्सलता एवं अडिगता में अपना कोई सानी नहीं रखता। बप्पारावल, पद्मिनी, मीराँबाई, महाराणा हम्मीर, महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, महाराणा राजसिंह, हाड़ी रानी तथा पन्नाधाय जैसे अनेक महनीय नाम इस पावन धरा से जुड़े हैं। 

इन्ही में से एक योद्धा थे महाराणा प्रताप। मेवाड़ के महान राजा महाराणा प्रताप सिंह का नाम कौन नहीं जानता! भारत के इतिहास में यह नाम वीरता, पराक्रम, त्याग तथा देशभक्ति जैसी विशेषताओं हेतु निरंतर प्रेरणादाई रहा है। महाराणा प्रताप का पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया है। प्रताप ऐसे योद्धा थे, जो कभी मुगलों के आगे नहीं झुके। कर्नल जेम्स टॉड लिखता है “मेवाड़ का ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां महाराणा प्रताप और उनके वीर साथियों ने बहादुरी न दिखाई हो”।  महाराणा प्रताप में अच्छे सेनानायक के गुणों के साथ-साथ अच्छे व्यस्थापक की विशेषताएँ भी थी।

Maharana Pratap History in Hindi | महाराणा प्रताप की जीवनी

जन्म दिवस तथा जन्म स्थान Maharana Pratap Birth and Birth Place

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 ई. (ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया वि.स. 1597) को कुम्भलगढ़ (कुंभलगढ़ किला) राजस्थान में हुआ था। दूसरी मान्यता यह है कि सिसोदिया वंश के सूरज महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई,सन 1540 (विक्रमी संवत 1597, जयेष्ट सुदी 3, रविवार) को अपनी ननिहाल पाली मारवाड़ में हुआ था।

महाराणा प्रताप के माता-पिता तथा परिवार Maharana Pratap Parents and Family

महाराणा प्रताप का पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया है। इनके पिता का नाम महाराणा उदय सिंह तथा माता का नाम जयवंताबाई सोनगरा (जयवन्ती देवी) था। महाराणा प्रताप के 3 भाई थे। जिनके नाम विक्रम सिंह, शक्ति सिंह, जगमाल सिंह था। महाराणा प्रताप की 2 सौतेली बहनें चाँद कँवर, मन कँवर थी। 

भाई – शक्ति सिंह, खान सिंह, विरम देव, जेत सिंह, राय सिंह, जगमल, सगर, अगर, सिंहा, पच्छन, नारायणदास, सुलतान, लूणकरण, महेशदास, चंदा, सरदूल, रुद्र सिंह, भव सिंह, नेतसी, सिंह, बेरिसाल, मान सिंह, साहेब खान। 

महाराणा प्रताप का विवाह Maharana Pratap Marriage 

महाराणा प्रताप ने कुल 11 महिलाओं से विवाह किया था। महाराणा प्रताप की पत्नियों में से उनकी सर्व प्रथम पत्नी का नाम अजबदे पंवार (Maharani Ajbade Punwar) था। जो कि अजबदे मेवाड़ की महारानी थी और इनके बेहद ही करीब थी। हालांकि राजनीतिक कारण से महाराणा प्रताप को 10 और शादियां करनी पड़ी थी।

महाराणा प्रताप की पहली पत्नी अजबदे का नाता राज परिवार से थे। अजबदे पंवार अमरसिंह सिसोदिया की माँ थी।अजबदे पंवार का जन्म 1542 ईसा पूर्व में हुआ था। इनके पिता का नाम राव माम्रक सिंह तथा माता का नाम हंसा बाई था। महाराणा प्रताप और अजबदे का जिस समय विवाह हुआ था उस समय अजबदे 15 साल और महाराणा प्रताप 17 साल के थे। अजबदे पंवार ने महाराणा प्रताप की राजनीतिक मामलों में काफी मदद की थी। 

महाराणा प्रताप की पत्नियों के नाम Maharana Pratap Wife’s names

  • महारानी अजबदे पुंवर
  • जसोदा बाई चौहान
  • फूल बाई राठौर
  • आलमदेबाई चौहान
  • चम्पाबाई झाली
  • लखबाई
  • आशा बाई खिचर 
  • पुरबाई सोलंकी 
  • शहामतबाई हाड़ा
  • अमरबाई राठौर
  • रत्नवतीबाई परमार

महराणा प्रताप के पुत्रों के नाम

अमर सिंह, भगवानदास,सहसमल, गोपाल, काचरा, सांवलदास, दुर्जनसिंह, कल्याणदास, चंदा, शेखा, पूर्णमल, हाथी, रामसिंह, जसवंतसिंह, माना, नाथा, रायभान।

महाराणा प्रताप की 11 रानियां व उनके 17 पुत्र

(1) महारानी अजबदे बाई

1557 ई. में बिजौलिया के सामन्त राम रख/माम्रख पंवार की पुत्री अजबदे बाई से महाराणा प्रताप का विवाह हुआ। आगे चलकर अजबदे बाई मेवाड़ की महारानी बनीं। महाराणा प्रताप की सभी पत्नियों में उनका सबसे अधिक साथ इन्होंने ही दिया। अजबदे बाई ने महाराणा प्रताप के लिए अपनी ज्योतिष विद्या से 100 वर्षों का पंचांग बनाया। अजबदे बाई के गुरु मथुरा के विट्ठल राय जी थे | गोंडवाना की रानी दुर्गावती व आमेर की हीर कंवर (जोधा बाई के नाम से मशहूर) ने भी इन्हीं गुरु से शिक्षा प्राप्त की।

गुरु विट्ठल राय जी को कृष्ण भक्ति के कारण मुगल यातनाएं भी सहनीं पड़ी। गोंडवाना की रानी दुर्गावती ने इनको 108 गांव प्रदान किए।

पुत्र  – 

  • महाराणा अमरसिंह
  • कुंवर भगवानदास

(2) रानी पुरबाई सोलंकिनी

पुत्र –

  • कुंवर गोपाल
  • कुंवर साहसमल – ये महाराणा प्रताप के तीसरे पुत्र थे। धरियावद के रावत इन्हीं के वंशज हैं। ये धरियावद के पहले कुंवर साहब भी हैं।

(3) रानी फूलबाई राठौड़

ये मारवाड़ के राव मालदेव की पौत्री व रामसिंह की पुत्री थी।

पुत्र –

  • कुंवर चंदा सिंह – ये महाराणा प्रताप के दूसरे पुत्र थे। इन्हें आंजणा (दरिया के पास) की जागीर दी गई।
  • कुंवर शेखासिंह – ये महाराणा प्रताप के चौथे पुत्र थे। इन्हें बहेड़ा, नाणा, बीजापुर (गोडवाड़) की जागीर दी गई।

(4) रानी चम्पाबाई झाली 

ये बड़ी सादड़ी के झाला मान की बहन थीं

पुत्र –

  • कुंवर कचरा/काचरा सिंह – इन्हें गोगुन्दा तहसील में स्थित जोलावास की जागीर दी गई।
  • कुंवर सांवलदास
  • कुंवर दुर्जन सिंह

(5) रानी जसोदाबाई चौहान

पुत्र –

  • कुंवर कल्याणदास/कल्याणसिंह – इन्हें उदयपुर के निकट परसाद नामक जागीर दी गई

(6) रानी शाहमती/सेमता बाई हाडा

पुत्र –

  • कुंवर पुरणमल – ये महाराणा प्रताप के 11वें पुत्र थे | इन्हें मांगरोप, गुरलां, गाडरमाला, सींगोली की जागीर दी गई | इनके वंशज पुरावत कहलाते हैं |

(7) रानी आशाबाई/आसबाई खींचण

पुत्र –

  • कुंवर हाथी सिंह – इन्हें दांतड़ा व गेंडल्या की जागीर दी गई
  • कुंवर रामसिंह – इन्हें उडल्यावास व मानकरी की जागीर दी गई

(8) रानी अलमदे बाई चौहान

पुत्र –

  • कुंवर जसवन्त सिंह – इन्हें जालोद व कारुंदा की जागीर दी गई

(9) रानी रत्नावती पंवार 

ये महारानी अजबदे बाई की बहन थीं | महारानी अजबदे बाई की इच्छा थी कि उनकी बहन का विवाह महाराणा प्रताप से हो | ये विवाह रानी रत्नावती पंवार की इच्छा के विरुद्ध हुआ, क्योंकि वे महाराणा प्रताप के साथ जंगलों में संघर्षपूर्ण जीवन नहीं व्यतीत करना चाहती थीं |

पुत्र –

  • कुंवर माल सिंह

(10) रानी अमर बाई राठौड़

पुत्र –

  • कुंवर नाथा सिंह

(11) रानी लखा बाई राठौड़

पुत्र –

  • कुंवर रायभाण सिंह

महाराणा प्रताप की पुत्रियाँ Maharana Pratap’s Daughters

ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि महाराणा प्रताप की कोई पुत्री नहीं थी, लेकिन कुछ इतिहासकारों के अनुसार महाराणा प्रताप की ये 5 पुत्रियां थीं –

रखमावती, रामकंवर, कुसुमावती, दुर्गावती, सुक कंवर।

महाराणा प्रताप का प्रारम्भिक जीवन Maharana Pratap’s Early Life

महाराणा प्रताप का बचपन भील समुदाय के साथ बिता, भीलों के साथ ही वे युद्ध कला सीखते थे। भील महाराणा को कीका नाम से पुकारते थे। (कीका – भील अपने पुत्र को कीका कहकर पुकारते है।) जनजाति वर्ग के बाल-गोपालों के साथ प्रताप का यही संबंध आगे चल कर भीलों के स्वतंत्रता युद्ध में शामिल होने का आधार बना।

जब महाराणा प्रताप का जन्म हुआ उस समय कुम्भलगढ़ में युद्ध की गंभीर स्थिति बनी हुई थी। कुंभलगढ़ किसी तरह से सुरक्षित नही था। जोधपुर के शक्तिशाली राठौड़ी राजा राजा मालदेव उन दिनों उत्तर भारत मे सबसे शक्तिसम्पन्न थे। एवं जयवंता बाई के पिता एवम पाली के शाषक सोनगरा अखेराज मालदेव का एक विश्वसनीय सामन्त एवं सेनानायक था। 

बनवीर से बचते बचाते पन्ना धाय उदय सिंह की फूलों की टोकरी के साथ कुम्भलगढ़ पहुँच गयी. कुम्भलगढ़ में आशा शाह देपुरा को कुंवर उदय सिंह को सौंपकर पन्ना धाय चित्तोड़ वापस चली आई, उस समय उदय सिंह की आयु केवल 15 वर्ष की थी. यहीं पर उदय सिंह ने शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने फिर जयवंताबाई से शादी की. प्रताप का जन्म ही युद्ध के दौरान हुआ था, एक तरफ उदय सिंह अपनी मातृभूमि को वापस पाने के लिए बनवीर से युद्ध कर रहे थे और इसी शुभ क्षण में भगवान एकलिंग का अवतार लिए प्रताप सिंह धरती में पधारे. उनके जन्म के उत्सव में चार चाँद तब लग गए जब ये खबर आई की महाराणा उदय सिंह बलवीर को हरा वापस चित्तोड़ के किला पर अपना अध्यापत स्थापित कर चुके है, प्रताप के जन्म की उत्सव चित्तोडगढ के किला में ही बड़े धूम धाम से मनाया गया।

प्रताप अपनी माँ जयवन्ती देवी के पास कुम्भलगढ़ में रहकर शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करने लगा। माँ ने उसे बचपन में ही स्वतंत्रता की घुट्टी पिला दी थी। निहत्थे शत्रु पर वार न करने की सलाह देकर, दो तलवारें रखने का आग्रह किया। माँ की शिक्षा से प्रताप निरन्तर शस्त्र व शास्त्र का ज्ञान प्राप्त कर रहे थे।

सन् 1552 ई. में प्रताप माँ के साथ चित्तौड़ आ गये। चित्तौड़ के झाली महल में रहने लगे। कृष्णदास रावत के देख-रेख में उनकी शस्त्र शिक्षा प्रारम्भ हो गई। वे शीघ्र ही तलवार, भाला तथा घुड़सवारी कला में पारंगत हो गये। इसी समय मेड़ता से चित्तौड़ आए जयमल राठौड़ से प्रताप ने युद्ध संबंधी विशेष ज्ञान प्राप्त किया। व्यूह बनाकर, शत्रुदल को परास्त करने की अनेक विधियाँ सीखीं तथा खासतौर पर छापामार युद्ध कला में प्रताप ने निपुणता प्राप्त कर ली। सोलह-सत्रह वर्ष की अल्पायु में प्रताप सैनिक अभियानों पर जाने लगे। वागड़ के साँवलदास व उनके भाई करमसी चैहान को सोम नदी के किनारे यु़द्ध में परास्त किया। छप्पन क्षेत्र के राठौड़ों व गौड़वाड़ क्षेत्र को भी परास्त कर अपने अधीन किया। उनकी वीरता की सर्वत्र प्रशंसा होने लगी। इसी समय महाराणा प्रताप का विवाह राव मामरख पंवार की पुत्री अजबांदे के साथ हुआ। प्रताप ने इस समय देश की राजनीतिक स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करना प्रारंम्भ कर दिया। भविष्य को ध्यान में रखते हुए प्रताप ने मित्रों का चयन कर, उन्हें प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया। 16 मार्च 1559 ई. में प्रताप को महारानी अजबंदे की कोख से अमरसिंह नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।

महाराणा प्रताप के गुरु राघवेन्द्र Maharana Pratap’s Guru Raghavendra

ये कुंवर प्रताप व कुंवर शक्ति के गुरु थे। एक दिन जब आचार्य राघवेन्द्र कुंवर प्रताप व कुंवर शक्ति को शिक्षा दे रहे थे, तभी अचानक एक शेर दबे पाँव से कुंवर शक्ति की तरफ बढ़ा, जब कुंवर शक्ति ने मुड़कर पीछे देखा, तब तक कुंवर प्रताप शेर का काम तमाम कर चुके थे।

जैताणा का युद्ध (कुंवर प्रताप का प्रथम युद्ध) Battle of Jaitana (First War of Maharana Pratap)

जैताणा का युद्ध 1555 ई. में हुआ । महाराणा उदयसिंह ने डूंगरपुर रावल आसकरण पर कुंवर प्रताप के नेतृत्व में सेना भेजी ये युद्ध बांसवाड़ा के आसपुर में सोम नदी के किनारे हुआ डूंगरपुर के रावल आसकरण ने राणा सांवलदास के नेतृत्व में फौज भेजी राणा सांवलदास का भाई कर्णसिंह मारा गया मेवाड़ की ओर से कोठारिया व केलवा के जग्गा जी वीरगति को प्राप्त हुए | जग्गा जी के पुत्र पत्ता चुण्डावत हुए | मेवाड़ की विजय हुई और 15 वर्ष के कुंवर प्रताप ने वागड़ के बड़े हिस्से पर अधिकार कर मेवाड़ में मिला लिया | ये कुंवर प्रताप के कुंवरपदे काल (राज्याभिषेक से पूर्व) की पहली उपलब्धि थी

कुंवरपदे काल (राज्याभिषेक से पूर्व) की दूसरी उपलब्धि Second achievement of Kunwar Pratap (before coronation)

कुंवर प्रताप ने छप्पन के राठौड़ों को पराजित कर छप्पन (56 इलाकों के समूह) पर अधिकार कर लिया । बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ के बीच का भाग छप्पन कहलाता है

महाराणा प्रताप और अकबर Maharana Pratap and Akbar

भारत में उस समय अकबर अपने साम्राज्य का विस्तार करने में लगा था। सम्पूर्ण राजपूताना उसके समक्ष झुक गया था। केवल मेवाड़ अडिग था। अकबर का आक्रमण मेवाड़ पर प्रतीक्षित था। भविष्य के संघर्ष की योजना बनने लगी। प्रताप ने विश्वस्थ मित्रों भामाशाह, ताराचंद, झाला मानसिंह आदि वीरों के साथ विजय स्तम्भ की तलहटी में सम्पूर्ण स्थितियों पर विचार करते। मेवाड़ की सुरक्षा की योजना बनाते। इसी दौरान आपसी मन मुटाव के कारण प्रताप का छोटा भाई शक्तिसिंह नाराज होकर अकबर के पास चला गया था। अकबर के मेवाड़ आक्रमण की योजना पर वह चित्तौड़ लौट आया तथा समाचार दिया। युद्ध परिषद् के निर्णय के कारण महाराणा उदयसिंह सपरिवार उदयपुर चले गये। प्रताप को भी मन मसोस कर साथ में जाना पड़ा। पीछे कमान जयमल राठौड़ एवं पत्ता चूँड़ावत को सौंपी गई। अक्टूबर 1567 ई. में अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। 4 मास घेरा डाले रखा परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। सर्वशक्तिमान बादशाह का गर्व चित्तौड़ के समक्ष चूर-चूर हो गया। उसने टोडरमल को भेज जयमल को खरीदने का प्रयास किया। किन्तु जयमल ने प्रस्ताव ठुकरा दिया और युद्ध में मुकाबला करने को कहा। किले में रसद खत्म हो गई। तब 25 फरवरी 1568 ई. के पावन दिन सतीत्व रक्षार्थ पत्ता चूँड़ावत की पत्नी महारानी फूल कंवर के नेतृत्व में 7000 क्षत्राणियों ने जौहर किया। उधर वीरों ने केसरिया बाना धारण कर हर हर महादेव के गगनचुम्बी उद्घोष के साथ शत्रुओं के खून से माँ काली का खप्पर भरने हेतु प्रस्थान किया। जयमल राठौड़ के घुटने पर चोट लगने के कारण वे अपने भतीजे कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठ कर यु़द्ध करने आए। इनके चतुर्भुज स्वरूप ने मुगल सेना पर कहर बरपा दिया। यह देख अकबर भी हतप्रभ रह गया। इन्हें रोकने का प्रयास किया गया। इनका सामना करने की हिम्मत किसी में नहीं थी अंततः पीछे से वार कर जयमल एवं कल्ला राठौड़ के मस्तक काट दिये। पाडन-पोल के पास जयमल का बलिदान हुआ। साहसी वीर कल्ला का सिर कटने के बाद भी धड़ लड़ता रहा। अनेकों मुगलों को मौत के घाट उतारकर वे भी रणखेत रहे।

उदय सिंह की मृत्यु  

अकबर ने किले में प्रवेश कर वहाँ रह रहे 30 हजार निर्दोष स्त्री, पुरुष एवं बच्चों का कत्लेआम कर अपनी जीत का जश्न मनाया। महाराणा उदयसिंह इस हार को सहन नहीं कर सके। इसी दौरान उन्होंने गोगुन्दा को राजधानी बनाया। अस्वस्थता के कारण 28 फरवरी 1572 ई. में होली के दिन उनका स्वर्गवास हो गया।

महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक Rajyabhishek (Coronation) of Maharana Pratap

महाराजा उदय सिंह की मृत्यु के दिन में श्मशान में युवराज प्रताप को देखकर सामन्तों में कानाफूसी होने लगी। तब मालूम हुआ कि भट्टियाणी राणी के पुत्र जगमाल को उदयसिंह ने अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। मेवाड़ की परम्परानुसार ज्येष्ठ पुत्र ही गद्दी का हकदार होता है लेकिन उदयसिंह ने महारानी की बातों में आकर जगमाल को युवराज घोषित कर दिया था। इस विपरीत परिस्थिति में कृष्णदास एवं रावत सांगा ने सामन्तों से विचार विमर्श कर महाराणा प्रताप को ग्द्दी पर बैठाने का निर्णय लिया। उन्होंने उदयसिंह का दाहसंस्कार कर श्मशान से लौटते समय महादेवजी की बावड़ी पर 28 फरवरी 1572 ई. को प्रताप का राजतिलक कर दिया। बाद में महलों में जाकर जगमाल को गद्दी से उतार कर 32 वर्षीय प्रताप का विधिवत राज्याभिषेक किया गया।

महाराणा प्रताप की प्रतिज्ञा Maharana Pratap’s Pledge

यह काँटों भरा ताज था। मेवाड़ क्षेत्रफल, धन-धान्य में छोटा हो गया था। प्रताप ने सैन्य पुनर्गठन व राज्य व्यवस्था पर ध्यान दिया। जनशक्ति को जाग्रत करने हेतु प्रताप ने भीषण प्रतिज्ञा की ‘‘जब तक मैं शत्रुओं से अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र नहीं करा लेता तब तक मैं न तो महलों में रहूँगा, न ही सोने चाँदी के बर्तनों में भोजन करूँगा। घास ही मेरा बिछौना तथा पत्तल -दोने ही मेरे भोजन पात्र होंगे।’’

इस भीषण प्रतिज्ञा का व्यापक प्रभाव हुआ। सारे जनजाति क्षेत्र के भील आदिवासी प्रताप की सेना में शामिल होने लगे। मेरपुर-पानरवा के भीलू राणा पूँजा अपने दल-बल के साथ प्रताप की सेना में शामिल हो गये। इन्हीं वीर सैनिकों ने वनवास काल में प्रताप का साथ दिया था।

संधि वार्ता हेतु प्रस्ताव Proposal for Treaty Negotiations

अकबर का साम्राज्य पूरे भारतवर्ष में फैल गया था। सारे राज्य उसके समक्ष झुक गए किन्तु मेवाड़ झुका नहीं। अकबर ने कूटनीतिज्ञ प्रयास प्रारंभ किए। उसने नवम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ कोरची को संधि वार्ता हेतु भेजा। प्रताप को मालूम था कि युद्ध होकर रहेगा किन्तु तैयारी हेतु समय चाहिए। इसलिए कूटनीति का जवाब कूटनीति से दिया। जलाल खां को पुचकार कर भेज दिया।

इसके बाद दूसरे संधिकार के रूप में आमेर का राजकुमार कुँवर मानसिंह जून 1573 ई. में वार्ता करने मेवाड़ आया। प्रताप ने उदयसागर की पाल पर उसका स्वागत किया। किन्तु मानसिंह अपने प्रयासों में सफल नहीं हो पाया। वह असफल होकर लौट गया। प्रताप व अकबर के बीच हजारों नर-नारियों के बलिदान व जौहर की लपटों की लकीर थी। हजारों ललनाओं के माँग के सिन्दूर को पार कर अकबर से समझौता करना प्रताप जैसे स्वाभिमानी एवं स्वतंत्रता के उपासक के लिए संभव नहीं था। अकबर ने फिर भी प्रयास जारी रखे।

उसकी ओर से तीसरे राजदूत आमेर के राजा भगवन्तदास सितम्बर 1573 ई. में महाराणा के पास आए। उन्हें भी प्रताप ने ससम्मान रवाना कर दिया।

इसके बाद अकबर ने अपने नौ रत्नों में से एक टोडरमल को वार्ता के लिए भेजा। दिसम्बर 1573 ई. में, प्रताप ने टोडरमल को भी सम्मान सहित लौटा दिया।

हल्दीघाटी का युद्ध Battle of Haldighati

लगभग 445 साल पहले राजस्थान में हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ राजा महाराणा प्रताप तथा मुगल शासक अकबर के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील थे। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार हकीम खाँ सूरी थे। महाराणा प्रताप खुद इस युद्ध में मोर्चा संभाले थे तो अकबर की ओर से कमान मान सिंह के हाथों में थी.

महाराणा प्रताप के 22,000 सैनिक अकबर की 80,000 सेना से हल्दी घाट में भिड़े । महाराणा प्रताप तथा उसके सैनिकों ने युद्ध में बड़ा पराक्रम दिखाया किंतु उसे पीछे हटना पड़ा। प्रताप ने हल्दीघाटी के एक संकरे दर्रे से निकल कर मुगल सेना पर आक्रमण किया। राणा की सेना में झाला मान, हकीम खाँ, ग्वालियर के राजा रामसिंह तंवर आदि वीर थे। इस भीषण आक्रमण को मुगल सेना झेल नहीं पाई। सीकरी के शहजादे शेख मंजूर, गाजी खाँ बदख्शी हरावल दस्ते में थे। प्रताप सेना ने प्रचंड हमला बोला तो मुगल सेना 8-10 कोस तक भागती चली गई और मोलेला स्थित अपने डेरे तक पहुँच गई। इस पहले ही आक्रमण के कारण, मुगलों के छक्के छूट गये तथा सारी सेना में भंयकर डर व्याप्त हो गया। ऐसी स्थिति में चंदावल दस्ते के प्रमुख मिहत्तर खाँ ने ढ़ोल बजाकर मुगल सेना को रोका और कहा कि अकबर स्वयं आ रहा है। इससे सेना को ढ़ाढ़स बंधा। बिखरी सेना को एकत्रित कर खमनोर ग्राम के मैदान पर लाया गया। यह स्थान रक्त तलाई कहलाता है। यहाँ दोनों सेनाओं में घनघोर युद्ध हुआ।

चिरकाल की क्षुधा के बाद राजपूतों की तलवारें भूख, प्यास की तीव्रता सी चमक उठी। ये रणचंडियां सैंकड़़ों मुगलों का रुधिर पान करके शांत हुई। प्रताप ने मानसिंह पर हमला बोला। महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने अगली दोनों टांगे हाथी के मस्तक पर दे मारी। प्रताप के सवा मण के भाले की मार से महावत मर गया, हौदा टूट गया। मानसिंह छिप गया तो प्रताप ने कटार फेंकी लेकिन फिर भी मानसिंह छुप कर अपनी जान बचाने में सफल रहा। शत्रु का काम तमाम समझ, प्रताप ने चेतक को हटा लिया। चेतक की टाँग, हाथी की सूँड पर लगी तलवार से कट गई फिर भी वह युद्ध भूमि में विचरण कर रहा था। महाराणा प्रताप ने तलवार के एक ही वार से जिरह, बख्तरव एवं घोड़े सहित बहल्लोल खाँ के दो फाड़ कर दिए। मानसिंह का हाथी बिना महावत के मैदान से भाग गया। मुगल सेना में भगदड़ मच गई तो अतिरिक्त तोपखाना लाया गया। इस बदली हुई परिस्थिति में प्रताप ने पूर्व निर्धारित योजनानुसार अपनी सेना के दोनों भागों को एकत्रित कर पहाड़ों पर मोर्चाबन्दी कर ली। पीछे सादड़ी के झाला मानसिंह ने वीरतापूर्वक शत्रुसेना को रोकते हुए अपना बलिदान दे दिया। इस युद्ध में रक्त का तालाब बन गया था इसलिए यह रक्त-तलाई कहलाया। रामदास मेड़तिया, हकीम खाँ सूरी, रामसिंह तंवर एवं उनके तीनों पुत्रों का बलिदान हुआ। प्रताप के लगभग 150 वीर शहीद हुए, मुगल सेना को भारी क्षति पहुँची, लगभग 500 सैनिक मारे गये। मेवाड़ी सेना के पहाड़ों में घात लगाये बैठे होने के कारण मुगल सेना डर कर अपने डेरे में लौट गई।

यह युद्ध लगभग चार महीने चला, जिसमे कई सैनिको ने अपनी जान गँवा दी।

महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक

महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और प्रसिद्ध नीलवर्ण ईरानी मूल के घोड़े का नाम चेतक था। चेतक अश्व गुजरात के काठियावाड़ी व्यापारी ईरानी नस्ल के तीन घोडे चेतक, त्राटक और अटक लेकर मारवाड आया। अटक परीक्षण में काम आ गया। त्राटक महाराणा प्रताप ने उनके छोटे भाई शक्ति सिंह को दे दिया और चेतक को उन्होंने स्वयं रख लिया।
हल्दी घाटी – (1576) के युद्ध में चेतक ने अपनी अद्वितीय स्वामिभक्ति, बुद्धिमत्ता एवं वीरता का परिचय दिया था। युद्ध में बुरी तरह घायल हो जाने पर भी महाराणा प्रताप को सुरक्षित रणभूमि से निकाल लाने में सफल रहा। हल्दीघाट के युद्ध में ‘ चेतक ’ गंभीर रुप से घायल हो गया था। युद्ध से लौटते समय घायल चेतक ने प्रताप को लेकर 20 फीट चैड़ा बरसाती नाला पार कर डाला। लेकिन नाला पार करते ही वह बुरी तरह से घायल हो गया। समीप ही इमली के पेड़ के पास जाकर गिर पड़ा तथा यहीं पर उसका प्राणांत हो गया। इस स्वामिभक्त तुरंग के बलिदान से प्रताप बहुत दुःखी हुए। प्रताप ने महादेव जी के मंदिर के पास उसे समाधि दी। इसी जगह चेतक का स्मारक बना है, जो हमें आज भी प्रेरणा दे रहा है।

हिंदी कवि श्याम नारायण पाण्डेय द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य हल्दी घाटी में चेतक के पराक्रम एवं उसकी स्वामिभक्ति की मार्मिक कथा वर्णित हुई है। आज भी राजसमंद के हल्दी घाटी गांव में चेतक की समाधि बनी हुई है, जहाँ स्वयं प्रताप और उनके भाई शक्तिसिंह ने अपने हाथों से इस अश्व का दाह-संस्कार किया था। महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है, जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है।  चेतक की स्वामिभक्ति पर बने कुछ लोकगीत मेवाड़ में आज भी गाये जाते हैं।

महाराणा प्रताप का हाथी रामप्रसाद

आप सब ने महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा, लेकिन उनका एक हाथी भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल- बदायुनी, जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है। वो लिखता है की- जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढाई की थी, तब उसने दो चीजो को ही बंदी बनाने की मांग की थी । एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद।

आगे अल बदायुनी लिखता है की- वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था । वो आगे लिखता है कि- उस हाथी को पकड़ने के लिए हमने 7 बड़े हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया और उन पर 14 महावतो को बिठाया, तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।

उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया। जहाँ अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा।

रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया। पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न तो दाना खाया और न ही पानी पिया और वो शहीद हो गया। तब अकबर ने कहा था कि- जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं झुका पाया, उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा?

हल्दीघाटी युद्ध के बाद 

वांछित सफलता प्राप्ति से पूर्व ही मुगल सेना सितम्बर 1576 ई. में अजमेर लौट गई। जून में प्रारंभ हुआ यह युद्ध सितम्बर में मुगल सेना के अजमेर लौटने पर समाप्त हुआ। इस युद्ध ने अकबर के आज तक अपराजित रहने के मिथक को तोड़ दिया। अकबर इस अभियान से अत्यन्त निराश हुआ वहीं महाराणा प्रताप एवं उसके साथियों की ख्याति बढ़ी। उनके हौसले बुलन्द हुए। महाराणा प्रताप भारत भर में प्रसिद्ध हुए। हल्दीघाटी यु़द्ध ने प्रताप के शौर्य एवं प्रताप को चहुँ ओर फैला दिया। लगभग 4 मास तक हल्दीघाटी युद्ध चला, जिसमें अकबर जैसे भारत विजेता को मेवाड़ जैसे छोटे राज्य के सामने वांछित सफलता नहीं मिल पाई।

इससे नाराज अकबर ने सेनापति मानसिंह एवं आसफ खाँ की ढ़योढ़ी (दरबार में प्रवेश) बंद कर दी। अब वह स्वयं 11 अक्टूबर 1576 ई. में प्रताप को परास्त करने अजमेर से निकल पड़ा। वह खमनोर के बादशाह बाग में ठहरा। किन्तु प्रताप के पहाड़ों में छिपे होने के कारण अकबर को सफलता नहीं मिली। दिसम्बर में वह भी असफल होकर लौट आया।

अक्टूबर 1577 से नवम्बर 1579 ई. के मध्य सेनापति शाहबाज खाँ को प्रताप को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने भेजा। वह तीन बार आक्रमण करने आया उसने मेवाड़ पर भयंकर कहर ढ़ाया। किन्तु प्रताप की छापामार युद्ध पद्धति के आगे शाहबाज खाँ ने घुटने टेक दिये। वह असफल होकर लौट गया।

अब अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना को प्रताप पर आक्रमण करने भेजा। यह छठा आक्रमण था। उसकी भी फजीहत हुई।

महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह ने खानखाना के शेरपुर डेरे पर आक्रमण कर सारी सामग्री सहित उनकी बेगम आनीखान एवं पूरे परिवार को उठा कर अपने कब्जे में किया। जब अमरसिंह द्वारा बेगम एवं अन्य औरतों को बंदी बनाने का समाचार प्रताप को मिला तो उन्होंने तत्काल अपने पुत्र को समझाया और कहा कि हम हिन्दु हैं, पराई स्त्री हमारे लिए माँ के समान है और तुम इन्हें उठा कर ले आए। तुमने गलती की है, अब तुम्हीं इन्हें ससम्मान लौटा कर आओ। अमरसिंह ने क्षमा माँग कर बेगम सहित अन्य औरतों को उनके डेरे पहुंचा दिया। महाराणा प्रताप के इस मानवीय एवं वीरोचित व्यवहार का अब्दुल रहीम खानखाना पर गहरा प्रभाव हुआ। बेगम ने जब खानखाना को पूरा घटनाक्रम बताया।

भामाशाह का योगदान 

हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप के अभिन्न मित्र भामाशाह (जन्म 28 जून, 1547 ई.) व उनके भाई ताराचंद ने मालवा क्षेत्र को लूट कर तथा पूर्वजों का संचित धन लेकर सितम्बर 1578 ई. में आवरगढ़ में महाराणा प्रताप के समक्ष उपस्थित हुए। यह धन 25 लाख रूपये व 20,000 स्वर्ण अशर्फियाँ थीं। माना जाता है कि इस धन से 25000 की सेना का 12 वर्ष तक निर्वाह हो सकता था। प्रताप अपार धन प्राप्त कर प्रसन्न हुए। अब तक छापामार युद्ध करते आए महाराणा ने दिवेर थाने पर आक्रमण कर दिया। यहाँ अकबर का चाचा सुल्तान खाँ थानेदार था। भामाशाह व कुँवर अमरसिंह के नेतृत्व में यह आक्रमण किया गया। प्रताप स्वयं भी साथ में थे। सुल्तान खाँ के हाथी के पैर काट दिये तो वह घोड़े पर सवार होकर युद्ध करने आया। अमरसिंह ने उससे मुकाबला किया।

महाराणा प्रताप ने मालवा के मुगल थाने पर आक्रमण करने के लिए दानवीर भामाशाह के भाई ताराचन्द कावड़िया को मालवा में रामपुरा की तरफ भेजा। मालवा में बस्सी नामक स्थान पर ताराचन्द का मुकाबला मुगल सेनापति शाहबाज खां से हो गया। ताराचन्द घोड़े से गिर गए व बुरी तरह ज़ख्मी हो गए। बस्सी के राव साईंदास देवड़ा ताराचन्द को अपने घर ले गए व उनका उपचार किया।

महाराणा प्रताप को जब ताराचन्द के ज़ख्मी होने का पता चला, तो महाराणा ने दरबार बुलाकर कहा कि भामाशाह और ताराचंद ने मुश्किल दिनों में मेवाड़ को नया जीवनदान दिया, अब ताराचंद के प्राण बचाना हमारा कर्तव्य हुआ।
महाराणा ने तकरीबन 500 घुड़सवारों के साथ फौरन मालवा कूच किया। मालवा पर मुगलों का अधिकार था, जिस वजह से महाराणा प्रताप का वहां जाना लगभग असम्भव था, यहां तक की महाराणा के लिए मेवाड़ की सीमा पार करना भी एक चुनौती थी, पर महाराणा प्रताप ताराचन्द तक पहुंचने में सफल हुए और मालवा से निकले। मालवा से मेवाड़ के रास्ते में जितने भी मुगल थाने आए, महाराणा प्रताप ने उनको न सिर्फ हटाया, बल्कि मालवा के सबसे बड़े मुगल थाने दशोर (वर्तमान में मन्दसौर) को तहस-नहस करते हुए ताराचन्द को सुरक्षित चावण्ड ले आए।

अमरसिंह के भाले के वार ने सुल्तान खाँ को घोड़े सहित जमीन में गाड़ दिया। भाले की तीव्रता के कारण सुल्तान खाँ तड़फड़ाने लगा। भाला निकलवाने का यत्न किया गया परन्तु कोई भी वीर नहीं निकाल सका। तब अमरसिंह ने एक ही झटके में भाला उसके सीने से निकाल दिया। सुल्तान खाँ ने वीर अमरसिंह को निहार कर सलाम किया। फिर सुल्तान खाँ के पानी माँगने पर महाराणा प्रताप ने सदायशता दिखा कर स्वर्ण कलश में जल मंगवाकर सुल्तान खाँ को पिलाया। जल पीकर उसने प्राण त्याग दिये। अकबर, चित्तौड़ आक्रमण (1568 ई.) के समय 30000 निर्दोष लोगों का कत्ले आम करता है और प्रताप मानवता दिखाकर शत्रु को जल पिलाते हैं। दोनों में कौन महान है? उत्तर स्वयंसिद्ध है।

चावण्ड को बनाया राजधानी 

अब अकबर ने प्रताप को पकड़ने के लिए सातवाँ आक्रमण जगन्नथा कच्छवाहा के नेतृत्व में किया। लेकिन प्रताप की रणनीति के आगे वह भी असफल होकर लौट आया। प्रताप ने लगातार मुगल थानों पर आक्रमण कर मुगलों को मेवाड़ से भगा दिया। अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करते हुए मेवाड़ के सभी ठिकानों को स्वतंत्र करा लिया। चित्तौड़ व माण्डलगढ़ पर प्रताप के छोटे भाई सगर का राज्य होने के कारण उसे छोड़ दिया गया। सात भीषण आक्रमण करने के बाद भी वांछित सफलता से विहीन अकबर शांत होकर बैठ गया। समय पाकर प्रताप ने अब चावण्ड को अपनी राजधानी बनाया और 1585 ई. से पुननिर्माण का नया अध्याय प्रारंभ किया। कृषि, सिंचाई, सड़क, सुरक्षा, सैन्य पुनर्गठन किया गया। 1585 ई. से 1597 ई. तक 12 वर्षों का कालखण्ड मेवाड़ में वैभवकाल के रूप में स्मरण किया जाना चाहिए। इस समय अनेक मंदिरों, राजभवनों, किलों आदि का निर्माण करवाया गया। प्रताप युद्धकाल व शांतिकाल दोनों में ही महानायक के रूप में प्रमाणित हुए।

महाराणा प्रताप का देहांत 

अब अंतिम समय आ गया। वे मेवाड़ के भविष्य को लेकर चिन्तित थे। सभी सामंतों एवं युवराज अमरसिंह को बुलाकर, एकलिंग जी व दीपज्योति को साक्षी मान, मेवाड़ की रक्षा का संकल्प कराया। इस प्रकार उन्होंने अपना जीवन लक्ष्य पूर्ण किया। अपने जीवन के 57 बसंत पूर्ण कर माघ शुक्ला एकादशी तदनुसार 19 जनवरी, 1597 ई. को चावण्ड में अपनी ईहलीला पूर्ण की। प्रताप के देहावसान की खबर सुनकर सर्वत्र शोक की लहर फैल गई। संपूर्ण मेवाड से सामान्य जन से लगाकर प्रमुख लोग चावण्ड में एकत्रित हो गए। युवराज अमरसिंह ने विधि विधान के साथ चावण्ड से तीन कि.मी. दूर बण्डोली के तालाब पर प्रताप का दाह संस्कार किया। उपस्थित जन मैदिनी की आँखों से अश्रुधार प्रवाहित हो रही थी। समवेत स्वर में एकलिंग नाथ की जय हो के उद्घोष से आकाश गुँजायमान हो उठा। महाराणा प्रताप की मुत्यु का समाचार अकबर तक पहुँचा। उसके चेहरे पर उदासी और निराशा के भाव थे। 

मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे ।

महाराणा प्रताप की अंतिम इच्छा

महाराणा प्रताप की मृत्यु हो रही थी तब वे घास के बिछौनेपर सोए थे, क्योंकि चितौड़ को मुक्त करने की उनकी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई थी । अंतिम क्षण उन्होंने अपने बेटे अमर सिंह का हाथ अपने हाथ में लिया तथा चितौड़ को मुक्त करने का दायित्व उसे सौंपकर शांति से परलोक सिधारे । क्रूर बादशाह अकबर के साथ उनके युद्ध की इतिहास में कोई तुलना नहीं । जब लगभग पूरा राजस्थान मुगल बादशाह अकबरके नियंत्रणमें था, महाराणा प्रतापने मेवाड़ को बचाने के लिए 12 वर्ष युद्ध किया ।

महाराणा प्रताप का व्यक्तित्व

स्वाभिमान तथा धार्मिक आचरण प्रताप सिंह की विशेषता थी। महाराणा प्रताप बचपन से ही दृढ़ तथा बहादूर थे बड़ा होने पर यह एक महापराक्रमी पुरुष बनेगा, यह सभी जानते थे। सर्वसाधारण शिक्षा लेने से खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उन्हें अधिक रुचि थी।

महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो, लम्बाई 7’5” थी। महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था। कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था। आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |

जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे। तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि- हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए ? तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना, जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना।” लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था। “बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए” किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं।

कब तक बोझ संभाला जाए
द्वंद्व कहां तक पाला जाए
दूध छीन बच्चों के मुख से
क्यों नागों को पाला जाए
दोनों ओर लिखा हो भारत
सिक्का वही उछाला जाए
तू भी है राणा का वंशज
फेंक जहां तक भाला जाए

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