child growth and development | बाल विकास एवं वृद्धि

बाल मनोविज्ञान : विज्ञान की वह शाखा जिसके अंर्तगत बालको के विकास का अध्ययन किया जाता है, उसे बाल विकास कहते है।
बाल विकास के अंर्तगत गर्भावस्था से लेकर किशोरावस्था (परिपक्वता अवस्था) तक के बालको का अध्ययन किया जाता है।
बर्क ने कहा था कि “गर्भावस्था से किशोरावस्था तक का अध्ययन बाल विकास के अंतर्गत किया जाता है।”
बर्क ने ही सर्वप्रथम पहले बाल मनोविज्ञान को परिभाषित किया था तथा इसे बालको के व्यवहार का अध्ययन कहा।

बाल विकास की अवस्थाएँ : बाल विकास की निम्न चार अवस्थाएँ होती है –
(1) गर्भावस्था
(2) शैशवावस्था
(3) बाल्यावस्था
(4) किशोरावस्था

बाल विकास का इतिहास

18वीं शताब्दी में पेस्तालॉजी के द्वारा बाल विकास का वैज्ञानिक विवरण प्रस्तुत किया गया। पेस्तालॉजी ने अपने ही 3 1/2 वर्षीय पुत्र अल्बर्ट पर अध्ययन किया और एक पुस्तक “बेबी बायोग्राफी” लिखी। बेबी बायोग्राफी बालको के विकास से सम्बंधित पुस्तक है।
बालकों का व्यवहार वयस्कों से भिन्न होता है। दोनों के व्यवहार वयस्कों से भिन्न होता है। दोनों के व्यवहार एक समान न होकर अलग-अलग होता है। दोनों का क्षेत्र अलग होता है।

19वीं शताब्दी में अमेरिका में बाल अध्ययन आंदोलन कि शुरुवात हुई जिसके जन्मदाता स्टेनली हॉल थे। स्टेनली हॉल ने ही सर्वप्रथम बाल मनोविज्ञान में बालकों के लिए प्रश्नावली का निर्माण किया। इन्होने सम्पूर्ण अवस्था के विषय में सभी विकास कि अवस्थाओं का क्रमबद्ध अध्ययन किया। अतः इन्हें बाल मनोविज्ञान का जनक कहा जाता है।
अमेरिका में Child Study Society व Child Welfare Organization जैसी संस्थाओं की स्थापना भी स्टेनली हॉल ने की थी।
1887 में न्यूयार्क में सबसे पहले बाल-सुधार गृह स्थापित किया गया।
बाल मनोविज्ञान के जनक – स्टेनली हॉल

20वीं शताब्दी में क्रो एंड क्रो ने कहा “बीसवीं शताब्दी बच्चों की शताब्दी है।”

भारत में बाल विकास के अध्ययन की शुरुवात लगभग 1930 से मानी जाती है।

अभिवृद्धि एवं विकास

  • व्यक्ति के सभी पक्षों में होने वाले परिवर्तनों को विकास कहा जाता है।
  • शारीरिक पक्ष में होने वाले परिवर्तनों को अभिवृद्धि कहते है।

अभिवृद्धि एवं विकास में अंतर

  अभिवृद्धि विकास
1. केवल शारीरिक पक्ष में वृद्धि या कोशिकाओं में वृद्धि, इसके अंतर्गत आते है। सभी पक्ष (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक) में परिवर्तन
2. यह एकपक्षीय या एकांकी होती है। विकास बहुपक्षीय होता है।
3. इसका क्षेत्र संकुचित होता है। विकास का क्षेत्र व्यापक होता है।
4. वृद्धि के अंतर्गत लम्बाई, भार, चौड़ाई आदि में परिवर्तन होता है। विकास के अंतर्गत अंगों या कोशिकाओं की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
5. वृद्धि को सीधे नापा या तोला जा सकता है। विकास का सीधा मापन संभव नहीं है।
6. यह परिमाणात्मक/मात्रात्मक/संख्यात्मक होती है। यह मात्रात्मक व गुणात्मक दोनों प्रकार की होती है।
7. विवृद्धि सूचक विवृद्धि व ह्रास सूचक दोनों
8. वृद्धि कुछ समय पश्चात् रुक जाती है। विकास निरंतर जीवनपर्यन्त चलता रहता है।
9. वृद्धि में विकास सम्मिलित नहीं होता है। विकास में अभिवृद्धि निहित होती है।
10. वृद्धि केवल रचनात्मक होती है विकास रचनात्मक एवं विनाशात्मक दोनों प्रकार का होता है।
11. इसमें केवल बाह्य परिवर्तन होते है। जो कि दिखाई देते है। विकास में बाह्य एवं आंतरिक दोनों प्रकार परिवर्तन होते है।
12. केवल आकार बढ़ता है। सम्पूर्ण परिवर्तन होता है।
  • अभिवृद्धि एवं विकास एक-दूसरे के पूरक होते है न कि विपरीत। अर्थात जब तक अभिवृद्धि नहीं होगी विकास नहीं होगा। अभिवृद्धि होगी तभी विकास होगा। दोनों ही एक-दूसरे पर आश्रित है।
  • 18 वर्ष कि आयु तक लगभग पूर्ण विकास हो जाता है।
  • रचनात्मक परिवर्तन – ऐसे परिवर्तन जो बालक को किशोरावस्था की ओर ले जाते है। उन्हें रचनात्मक परिवर्तन कहते है। ये परिवर्तन विवृद्धि सूचक होते है।
  • विनाशात्मक परिवर्तन – ऐसे परिवर्तन जो व्यक्ति को वृद्धावस्था की ओर ले जाते है, उन्हें विनाशात्मक परिवर्तन कहते है। ये परिवर्तन ह्रास सूचक होते है।

विकास के विभिन्न आयाम/पक्ष/क्षेत्र

विकास के निम्न आयाम होते है –
(1) शारीरिक विकास     (2) मानसिक विकास     (3) सामाजिक विकास     (4) संवेगात्मक विकास

(1) शारीरिक विकास : शारीरिक विकास के चक्र को चार भागों में बांटा गया है –
(i) प्रथम चक्र – 0-2 वर्ष तक (तीव्र गति से विकास) जन्म से किशोरावस्था तक में से सबसे तेज विकास इसी अवस्था में होता है।
(ii) द्वितीय चक्र – 3-12 वर्ष तक (धीमा विकास)
(iii) तृतीय चक्र – 13-15 वर्ष तक (तीव्र विकास)
(iv) चतुर्थ विकास – 16-18 वर्ष तक (धीमा विकास)

हरलॉक ने कहा की बच्चों में उपर्युक्त विकास के चक्र लयात्मक होते है। नियमित नहीं होते है। अर्थात पहले तीव्र-धीमा-तीव्र-धीमा
शारीरिक विकास अन्य सभी प्रकार के विकास के लिए आधार का कार्य करता है क्योंकि शारीरिक विकास जन्म से पूर्व ही प्रारम्भ हो जाता है, जबकि अन्य विकास जन्म के बाद प्रारम्भ होते है।

शारीरिक विकास दो प्रकार का होता है –

(a) अंगीय विकास (अंगों का विकास)     (b) मांसपेशीय विकास/क्रियात्मक विकास/गत्यात्मक विकास/गामक विकास/गतिक विकास
(a) अंगीय विकास – अंगीय विकास के अंतर्गत बच्चों के वजन, लम्बाई में वृद्धि, श्वसन क्रिया से सम्बंधित वृद्धि, दातों की संख्या में वृद्धि एवं मस्तिष्क में वृद्धि होना आदि सम्मिलित है।

(b) माँसपेशीय विकास या गत्यात्मक विकास – माँसपेशीय विकास दो प्रकार का होता है –
(A) स्थूल गत्यात्मक विकास     (B) सूक्ष्म गत्यात्मक विकास
(A) स्थूल गत्यात्मक विकास – इस प्रकार के विकास में शरीर की बड़ी मांसपेशियाँ कार्य करती है, स्थूल गत्यात्मक विकास कहलाता है। इस प्रकार के विकास के अंतर्गत सम्पूर्ण शरीर हलचल करता है। जैसे – चलना, दौड़ना, खेलना, नृत्य करना आदि।

(B) सूक्ष्म गत्यात्मक विकास – ऐसा गत्यात्मक विकास जिसके अंतर्गत शरीर की छोटी या सूक्ष्म मांसपेशियाँ कार्य करती है, सूक्ष्म गत्यात्मक विकास कहलाता है। जैसे – लिखने में अँगुलियों की मांसपेशिया, आँख की मांसपेशियाँ, कलाई, कागज फाड़ना, पढ़ना, खाना खाना आदि।

शैशवावस्था में शारीरिक विकास

  • शैशवावस्था में जन्म के समय बालक का भार लगभग 7.15 पोंड व बालिकाओं का भार 7.13 पोंड होता है।
  • 1 वर्ष में शिशु का वजन लगभग 3 गुना हो जाता है तथा जन्म के समय व पुरे शैशवावस्था में बालकों का भार बालिकाओं के भार से अधिक होता है।
  • शैशवावस्था में बालक की लम्बाई 51.25 cm व बालिकाओं की लम्बाई 50.75 cm होती है। शैशवावस्था व जन्म के समय बालक की लम्बाई बालिकाओं की लम्बाई से अधिक होती है।
  • शैशवावस्था में जन्म के समय शिशु के सिर की लम्बाई उसके शरीर की कुल लम्बाई की 1/4 होती है तथा जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क का भार 150 gm होता है।
  • शैशवावस्था में नवजात शिशु की हड्डियां छोटी होती है तथा इनकी संख्या 270 होती है जो कोमल व लचीली तथा आपस में जुडी नहीं होती है।
  • शिशु में दांत बनने की प्रक्रिया गर्भावस्था के समय से ही प्रारम्भ हो जाती है लेकिन जन्म के समय शिशु के दांत नहीं होते है।
  • शैशवावस्था में जन्म से छठे माह में अस्थाई दांत आते है तथा 4 वर्ष तक बच्चों के सभी अस्थाई दांत आ जाते है, जिनकी संख्या 20 होती है।
  • लगभग 6 वर्ष की अवस्था में बालक के सभी अस्थाई दांत गिरने लग जाते है।
  • शिशु के हृदय की धड़कन 1 मिनट में 140 बार धड़कती है। 6 वर्ष की अवस्था में हृदय की धड़कन 100 प्रति मिनट हो जाती है।

बाल्यावस्था में शारीरिक विकास

  • बाल्यावस्था में हड्डियों की संख्या 270 से बढ़कर 350 हो जाती है।
  • बाल्यावस्था के अंत तक बालक के सभी स्थाई दांत 28 आ जाते है।
  • बाल्यावस्था में 12 वर्ष की आयु में हृदय की धड़कन 1 मिनट में 85 बार धड़कती है।
  • बाल्यावस्था में लड़के लड़कियों का भार व लम्बाई लगभग समान होता है या लड़कियों का भार लड़कों के भार से अधिक होता है।

किशोरावस्था में शारीरिक विकास

  • किशोरावस्था में बालकों का भार बालिकाओं से अधिक हो जाता है।
  • किशोरावस्था में लड़के और लड़कियों की लम्बाई तीव्रता से बढ़ती है और लड़के अधिक लम्बे हो जाते है।
  • किशोरों की लम्बाई 18 वर्ष तक तथा किशोरियों की लम्बाई 16 वर्ष तक बढ़ती है।
  • किशोरावस्था में सिर का लगभग पूर्ण विकास हो जाता है और मस्तिष्क का भार 1400 ग्राम तक हो जाता है।
  • किशोरावस्था के प्रवेश के समय सभी स्थाई दांत निकल आते है। किशोरावस्था में प्रज्ञादंत (4 दांत wisdom teeth) निकलते है। जिससे कुल दांत 28 + 4 = 32 हो जाते है।
  • किशोरावस्था में हृदय की धड़कन 72 प्रति मिनट हो जाती है।
  • किशोरावस्था में प्रजनन अंग विकसित हो जाते है। किशोरियों में यौन गुप्त किशोरों की अपेक्षा एक-दो पूर्व ही दिखाई देते है। ये लक्षण लड़कों में 12-14 वर्ष की आयु में तथा लड़कियों में 11-13 वर्ष की आयु में दिखाई देते है।

मानसिक विकास/संज्ञात्मक विकास

शारीरिक व मानसिक विकास के मध्य सबसे अधिक अंर्तसम्बन्ध पाया जाता है। मानसिक विकास के अंतर्गत संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, संप्रत्यय निर्माण, निर्णय, वाद-विवाद करना, समझ विकसित करना आदि आते है।
संवेदना – पहली बार किसी वस्तु या व्यक्ति विशेष के बारे में अहसास होना संवेदना है। यह ज्ञान की पहली सीधी है। जब तक किसी भी वस्तु/स्थान/व्यक्ति के बारे में पता नहीं हो, वह संवेदना है।
प्रत्यक्षीकरण – जब बच्चा का विकास होता है तो वह वस्तुओं/व्यक्तियों/स्थानों को जानने लग जाता है, जिसे प्रत्यक्षीकरण कहते है।
संप्रत्यय निर्माण (अवधारणा) – यह ज्ञान की दूसरी सीढ़ी है। किसी के बारे में पहले से बनाई हुई छवि, संप्रत्यय निर्माण या अवधारणा के अंतर्गत आती है। पहले से ज्ञात किसी वस्तु/व्यक्ति के बारे में उसके गुण/विशेषताओं के बारे में अवधारणा बना लेना।

शैशवावस्था में मानसिक विकास

  • नवजात शिशु जन्म के समय से ही छींकना, हिचकी लेना, दूध पीना, हाथ पैर हिलना, आराम न मिलने पर रोकर कष्ट प्रकट करना आदि क्रियाएं करता है।
  • 1 वर्ष की अवस्था में दूसरे व्यक्तियों की क्रियाओं का अनुकरण करता है।
  • 5 वर्ष में जटिल वाक्य बोल लेता है, रंगों में अंतर कर लेता है, अपना नाम लिख लेता है।
  • 6ठे वर्ष में बिना हिचके 13, 14 तक गिनती सुना देता है तथा सरल प्रश्नों के उत्तर दे देता है। शरीर के विभिन्न अंगों के नाम बता देता है।

बाल्यावस्था में मानसिक विकास

  • क्रो एंड क्रो के अनुसार “जब बालक लगभग 6 वर्ष का हो जाता है तब उसकी मानसिक योग्यताओं का लगभग पूर्ण विकास हो जाता है।”
  • बाल्यावस्था के प्रारम्भ में बालक दो वस्तुओं के मध्य अंतर कर सकता है। छोटी घटनाओं का वर्णन व कठिन वाक्यों को समझने की कोशिश करता है।
  • बाल्यावस्था के अंत में समस्या समाधान की क्षमता विकसित हो जाती है तथा आसान बातों का कारन बता देता है।
  • रचनात्मक शक्ति तथा आदर्श निर्माण इसी अवस्था में शुरू हो जाता है।

किशोरावस्था में मानसिक विकास

  • वुडवर्थ के अनुसार – “मानसिक विकास 15 से 20 वर्ष की आयु में अपनी उच्चतम सीमा पर पहुँच जाता है।”
  • जॉन्स एवं कोनार्ड के अनुसार 16 वर्ष में, स्पीयरमैन के अनुसार 14 से 16 वर्ष के बीच मानसिक विकास उच्चतम होता है।
  • किशोरावस्था में कल्पना शक्ति अधिक बढ़ जाती है। किशोर व किशोरियां दिवास्वप्न (दिन में सपने देखना कपोल कल्पित Fantasy) में खोया रहता है।
  • लड़कों की तुलना में लड़कियों में कल्पना शक्ति अधिक पाई जाती है।
  • किशोरावस्था में किशोर व किशोरियां दिवास्वप्न में खोये रहते है।
  • किशोरावस्था में सोचने समझने की क्षमता, तर्क एवं निर्णय लेने की क्षमता व रुचियों का विकास हो जाता है।

सामाजिक विकास
शैशवावस्था में सामाजिक विकास

  • क्रो एवं क्रो के अनुसार – “बच्चा प्रारम्भ में न तो सामाजिक प्राणी रहता है और न ही असामाजिक प्राणी होता है। परन्तु वह इस स्थिति में अधिक समय तक नहीं रहता है।”
  • पहले माह में नवजात शिशु साधारण आवाजों व मनुष्य की आवाज में अंतर नहीं जानता है। परन्तु 2 माह में वह व्यक्तियों की आवाज को पहचानने लग जाता है और दूसरों को देखकर मुस्कुराने लगता है।
  • 1 वर्ष का होने पर बालक बड़ों की आज्ञा मैंने लगता है और मना करने पर उस कार्य को नहीं करता है तथा परिवार का साथ घुल-मिल जाता है।
  • 3 वर्ष में बालक समूह में खिलौनों से खेलने लग जाता है।
  • बालक अंतर्मुखी होता है।
  • शैशवावस्था के अंत तक बालक सामूहिक खेलों में रूचि लेने लग जाता है तथा नैतिक भावना का विकास आरम्भ होने लगता है।

बाल्यावस्था में सामाजिक विकास

  • इस अवस्था के प्रारम्भ में बालक प्राथमिक विद्यालयों में प्रवेश करता है। जहाँ उसे अलग वातावरण मिलता है तथा नए दोस्त बनते है।
  • बाल्यावस्था में सहयोग, सद्भावना और सामाजिक मूल्यों का विकास होता है।
  • बालक का व्यक्तित्व बहिर्मुखी होता है।
  • बाल्यावस्था में बालक किसी ना किसी टोली का सदस्य होता है।
  • बाल्यावस्था में बालक व बालिका एक दूसरे से अलग होकर समलिंगी समूह बनाते हैं।
  • बालक, झूठ बोलना, बहाने बनाना इसी अवस्था में सीखता है।

किशोरावस्था में सामाजिक विकास

  • किशोरावस्था में अपने समूह के प्रति अत्यधिक भक्तिभाव होता है।
  • किशोरावस्था में बालक शादी, प्रेम, व्यवसाय, धन अर्जन, परीक्षा परिणाम व पारिवारिक जीवन के प्रति हमेशा चिंता प्रकट करता है।
  • किशोरावस्था में बालक में नेतृत्व सहयोग सद्भावना आदि गुणों का विकास होता है।
  • किशोरावस्था में बालक बालिकाओं में एक-दूसरे के प्रति बहुत आकर्षण उत्पन्न हो जाता है जिसके कारन वे वेशभूषा श्रृंगार व विशिष्टता का ध्यान रखते है।

संवेगात्मक विकास
बालक के संवेगात्मक विकास और उसके सामाजिक, नैतिक, चारित्रिक विकास को प्रभावित करते है। संवेग वास्तव में उपद्रव की अवस्था है। इसमें व्यक्ति सामान्य नहीं रहता है। संवेग जन्मजात व क्षणिक होते है।
रॉस के अनुसार – “संवेग चेतना की व्यवस्था जिसमें रागात्मक तत्व (feeling) तत्व की प्रधानता रहती है।”
वेलेंटाइन के अनुसार – “जब रागात्मक प्रकृति का वेग बढ़ जाता है, तभी संवेग की उत्पति होती है।”
वुडवर्थ के अनुसार – “संवेग व्यक्ति की उत्तेजित दशा है।”

शैशवावस्था में संवेगात्मक

  • ब्रिजेज के अनुसार – ” शिशु में जन्म के समय केवल उत्तेजना होती है और 2 वर्ष के अंत तक उसमें लगभग सभी संवेगों का विकास हो जाता है।
  • अपने जन्म के समय से ही अपनी चीख पुकार तथा हाथ पैर चलाने के द्वारा बच्चा अपने अंदर संवेगों की उपस्थिति का आभास कराता है।
  • शिशु के संवेगों में शुरू में अस्थिरता होती है लेकिन बाद में स्थिरता आ जाती है।
  • शिशु में संवेग अस्पष्टता से स्पष्टता की और बढ़ते है। नकारात्मक अनुशासन से शिशु के संवेगों का संतुलन बिगड़ जाता है।

बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास

  • क्रो एवं क्रो के अनुसार – “सम्पूर्ण बाल्यावस्था में संवेगों की अभिव्यक्ति में निरन्तर परिवर्तन होते रहते है।”
  • बाल्यावस्था में बालक के संबंधों में शिष्टता आ जाती है और उसमें संवेगों का दमन करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है।
  • बाल्यावस्था में बालक के संवेगात्मक विकास पर विद्यालय के वातावरण का व्यापक प्रभाव पड़ता है। बालक के संवेगात्मक विकास में शिक्षक का महत्वपूर्ण स्थान है।
  • बाल्यावस्था में बालक विभिन्न समूह का सदस्य होता है, जिससे घृणा, द्वेष, ईर्ष्या पाई जाती है।

किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास
कोल एवं ब्रश के अनुसार – “किशोरावस्था के आगमन का मुख्य चिन्ह संवेगात्मक विकास में तीव्र परिवर्तन है।”
बी एन झा के अनुसार – ” किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास इतना विचित्र होता है कि किशोर एक ही संवेगात्मक विकास इतना विचित्र होता है कि किशोर एक ही परिस्थिति में विभिन्न अवसरों पर विभिन्न प्रकार का व्यव्हार करता है। जो परिस्थिति एक अवसर उसे उल्लास से भर देती है। वही परिस्थिति दूसरे अवसर पर उसे खिन्न कर देती है।

  • किशोर व किशोरियों में प्रेम, दया, क्रोध, सहानुभूति आदि संवेग स्थाई रूप से आ जाते है।
  • किशोर की शारीरिक शक्ति की उसके संवेग ऊपर स्पष्ट छाप होती है।
  • किशोर को न तो बालक समझा जाता है और न ही प्रौढ़। अतः उसे अपनी संवेगात्मक जीवन में वातावरण से अनुकूलन करने में बहुत कठिनाई होती है।

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